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kpsinghorai


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समाजवाद चंद्रशेखर से मुलायम सिंह तक

Posted On: 10 Jul, 2016  
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रामगोपाल और शिवपाल में डाल-डाल, पात-पात का खेल

Posted On: 6 Jul, 2016  
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रामगोपाल और शिवपाल में डाल-डाल, पात-पात का खेल

Posted On: 3 Jul, 2016  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

प्रिय श्री के पी सिंह जी, सादर नमस्कार. आपके तर्कों से सहमत नहीं हो पा रहा हूँ.. मेरे अंदाज़ में उ प्रदेश में ब्राहण जन संख्या १० % के आस पास ही होगी. क्या इतने कक मतदाता के समर्थन से कांग्रेस सत्ता में आ जाएगी. आपका सारा विश्लेषण ब्राम्हणों के इर्द गिर्द ही घूमता है, बाकी ९० % जातियों का क्या होगा. चुनाव को आप मार्केटिंग के रूप में आप प्रस्तुतकर रहे हैं. पी के जैसे लोग कांग्रेस को वापस नहीं ला सकेंगेचाहे कितनी ही नौटंकी कर लें. डेमोक्रेसी मार्केटिंग की चीज़ नहीं है. यह जनता की पसंद की बात है, आप कहते हैं की भाजपा वर्ण व्यवस्था की पार्टी है. मैनें तो भाजपा में किसी वर्ण को प्रहय दिए जाते हुए नहीं देखा है. हाँ कांग्रेस ज़रूर जैसा आपने स्वयं लिखा ब्राम्हणों, दलितों, मुसलमानों के वोट नैंक पर आधारित पार्टी है. .अपने विश्लेषण में कृपया मुलायम सिंह और मायावती के लिए भी स्थान छोड़ दीजिये.

के द्वारा: Dr S Shankar Singh Dr S Shankar Singh

आपके विचार तर्कपूर्ण हैं । याकूब मेमन एक सुशिक्षित व्यक्ति था और विस्फोटों के हादसे में लपेटे जाने से पूर्व वह मुंबई के सर्वाधिक प्रतिभाशाली युवा चार्टर्ड एकाउंटेंटों में गिना जाता था । उसने विस्फोटों में कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं निभाई बल्कि वादामाफ़ गवाह बनकर जाँच एजेंसियों को पूरा सहयोग दिया तथा अन्य कई अपराधियों के पकड़े जाने में सीबीआई की सहायता की । उसे भारतीय अधिकारियों ने अपने प्रयासों से गिरफ़्तार नहीं किया था बल्कि उसने स्वेच्छा से आत्मसमर्पण किया था जिसके उपरांत उसने इक्कीस वर्ष जेल में भी बिताए । भारतीय दंड विधान वादामाफ़ गवाह के साथ रियायत करता है जो कि जनभावनाओं के ज्वार में बहकर हमारी न्यायपालिका ने याक़ूब मेमन को नहीं दी । उसने न तो कभी कोई देशविरोधी बात कही और न ही कभी मुस्लिम समाज को भड़काने का कोई प्रयास किया । हमारी व्यवस्था ने उसके साथ निश्चय ही अन्याय किया है क्योंकि वह काबू में आ गया बलि का बकरा था जिसकी बलि चढ़ाकर तथाकथित राष्ट्रवाद को संतुष्ट किया गया तथा राष्ट्रवाद की राजनीति करने वालों ने अपने लिए अतिरिक्त वोट पक्के किए । न्यायपालिका का भी इस संदर्भ में पक्षपाती हो जाना दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जाएगा । ऐसा वातावरण बना दिया गया है कि याक़ूब मेमन की फाँसी के विरोध में कोई भी तर्क देने वाला अनावश्यक रूप से देशविरोधी होने का बिल्ला अपने पर लगा बैठता है । अब हमारी नालायक पुलिस और सीबीआई टाइगर मेमन को पकड़ने के लिए कोई कदम नहीं उठा रही है क्योंकि याक़ूब मेमन को फाँसी देने से बलपूर्वक भड़काई गई जनभावनाएं ठंडी पड़ गई हैं तथा उनके राजनीतिक आकाओं को अपना राजनीतिक लाभ मिल गया है ।

के द्वारा: Jitendra Mathur Jitendra Mathur

के द्वारा: kpsinghorai kpsinghorai

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प्रिय के पी सिंह जी , आप के विचारों से पूरी तरह सहमत हूँ । पूज्य बाबा साहब अम्बेडर जी एक प्रखर राष्ट्रवादी नेता थे । उनके प्रत्येक प्रयत्न चाहे वह दलितों का उत्थान या उनका धर्म परिवर्तन प्रत्येक की पृष्ठभूमि में राष्ट्र का हित ही प्रथम रहा था । वह अपने समकालीन नेताओं में सर्वाधिक शिक्षित , योग्य और उच्चविचारशील  व्यक्ति थे । यह अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण है कि स्वातंत्र्योत्तर काल में उनकी प्रतिभा का समुचित उपयोग करने के स्थान पर उनके व्यक्तित्व को मात्र एक वर्ग के नेता के रूप में सिमित कर दिया गया । वह वास्तव में सम्पूर्ण  राष्ट्र के महान नेता थे । राष्ट्र की उनको वास्तविक श्रृद्धांजली यह ही होगी कि इस अधार्मिक ,अनैतिक और  असंवैधानिक जातिव्यवस्था को जल्द से जल्द तलांजलि दे कर , एक समतामूलक और समरसता पूर्ण समाज का निर्माण किया जाए। 

के द्वारा: anilkumar anilkumar

जय श्री राम ये लेख सेकुलरवादी और हिन्दू विरोधी मानसिकता से ग्रसित है.ओबमाजी के कहने का गलत अर्थ लगा कर सब लोग अपना उल्लू सीट कर रहे हैं.उन्होंने मिल्खा सिंह ,मैरी कोम और शाहरुक खान का उदारहण दे कर ये सन्देश दिया और तारिफ ही की किस तरह विभिन्न समुदाय के लोग देश की उन्नत में अपना सहयोग कर रहे है.हिन्दू के खून में सेकुलरिज्म है क्योंकि हिन्दुओं ने न किसी राष्ट्र पर हमला किया न ही किसी अन्य समुदाय का धर्मान्तरण जबकि ये बीमारी ईसाई और मुसलमानों ने लालच दे कर या तलवार के बल पर की आज भी इस्लामिक आतंकवाद से पूरा विश्व त्रस्त है उसकी निंदा करने की जगह कुछ लेखक और सेक्युलरिस्ट गलत मतलब निकल कर अपनी दूकान चला रहे हैं क्योंकि हिन्दू सबसे सस्ता इंसान है जिसपर आक्रमण किया जा सकता है.लेखक ने इसाईओ और मुसलमानों द्वारा धर्म परिवर्तन और लव जिहाद की निंदा न करके अपनी हिन्दू विरोधी मानसिकता का परिचय साहितिक भाषा का प्रयोग करके किया जी सराहनीय नहीं है.

के द्वारा: rameshagarwal rameshagarwal

के द्वारा: PAPI HARISHCHANDRA PAPI HARISHCHANDRA

के द्वारा: Dr S Shankar Singh Dr S Shankar Singh

चिंतन को प्रेरित करते दमदार तर्क । परंतु व्यवहारतन विभिन्नताओं से भरे इस देश में युद्धस्तरीय परिवर्तन के प्रयास किसी भी सरकार के लिए संभव नहीं हैं । यहाँ न तो चीन जैसी परिस्थितियाँ हैं और न ही वहाँ जैसी राजनैतिक संवैधानिक स्थिति ही है । स्वैच्छिक धर्मपरिवर्तन तक बखेड़े खड़ा कर देता है । हमारे संस्कार थ्येनआनमन जैसी घटना की अनुमति नहीं देते, जिसके माध्यम से कोई सरकार मनचाहा दमन कर कर सके । यहाँ इच्छाओं आदतों को समयबद्ध तरीके से ही परिवर्तित किया जा सकता है । ऐसा समझना जल्दबाज़ी होगी कि स्वदेशी मानसिकता वाली सरकार व्याप्त कुरीतियों के प्रति यथास्थितिवादी बनी रहेगी ।

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

इस कारण जरूरत इस बात की है कि अगर भारत को एक बेहतर देश बनाना है तो अपने धर्म को हमें धार्मिक बनाने की मशक्कत सबसे पहले करनी पड़ेगी। जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है धर्म की पहली पहचान समता का मूल्य है। वर्ण व्यवस्था को तिलांजलि देकर समता को सनातन धर्म के केेंद्र में लाएं उसे ईसाइयों की तरह दीनदुखियों की सेवा का धर्म बनाएं। जहां तक धर्मांतरण का सवाल है यह आसान नहीं होता। जो लोग सनातन धर्म में बुराई देखते हैं वे भी अपना घर छोड़कर जाना गवारा नहीं कर रहे और न करेंगे इसलिए एक दिन हिंदु धर्म समाप्त हो जाएगा। ऐसा कहने वाले इंसानी फितरत के जानकार नहीं हैं। धर्मांतरण, लव जिहाद, दूसरों के पूजा स्थलों को अपना बताकर ध्वस्त करने की कोशिश करना यह न तो मोदी सरकार के हित में है और न ही भारत राष्ट्र राज्य के हित में। मोदी ने जैसी फसल बोई है वैसी ही उन्हें काटनी पड़ रही है। संघ परिवार को सद्बुद्धि देने के लिए अब उन्हीं को अपने नेतृत्व कौशल का परिचय देना पड़ेगा।... महत्वपूर्ण बात!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: DEEPTI SAXENA DEEPTI SAXENA

के पी सिंह जी वर्तमान भारतीय राजनीती दलों की कोई विचारधारा नहीं रह गइ है वामपंथी विचार धारा ध्वस्थ हो चूकी है हिंदु विचारधारी जनसंघ से भारतीय जनता पार्टी से कांग्रेसमय हो चुकी है समाजवादी भाषण देकर ,धर्म निऱपेक्ष का चोला ओडकर पूॅजीवादी विकास को पोषित करना ही राजनीति हो चुकी है युग समुद्र मंथन का नहीं है ,मोदी की तरह विचार मंथन करो और जितना तेज आवाज और गति से मंथन करोगे   मक्खन से वोटर,सेंट्रीफ्युगल फोर्स से किनारे जम जायेंगे ।जब तक मोदी की आवाज और गति मैं दम है वे चिपके रहेंगे । अब ऐसा कुछ भी नहीं जिन विचार धारा मैं वोट दिया जाये ।जिस पर शांति  शांति की अनुभूती हो उसी को ओम बना दो ।

के द्वारा: PAPI HARISHCHANDRA PAPI HARISHCHANDRA

आपको इस बात का पूरा हक़ है की आप नेहरू जी के पक्ष में खड़े हों., लेकिन आप का यह कहना की नेहरू जी को हाशिये पर डालने के प्रयत्न चल रहे हैं, समझ से परे है. आज़ादी से लेकर नेहरू जी I मृत्य तक और उसके बाद आज तक नेहरू सल्तनत हर तरीके से देश पर छाई रही है इन लोगूँ को शिकायत करने का कोई औचित्य नहीं है. अगर किसी को शिकायत करने का कारन बनता है तो वे हैं सरदार पटेल, डा राजेंद्र प्रसाद, नेता जी सुभास चन्र बॉस, लाल बहादुर शास्त्री. सरदार भगत सिंह, चन्द्र शेखर आज़ाद और अन्य अनेक जिन्होनें अपने प्राणों की बलि दी. स्वंत्रता अंगरा में इनके योगदान की अवहेलना की गई. नेहरू जी के खिलाफ कोई नहीं है लेकिन उनको पर्याप्त मिल चूका है. जो छूटे हुए हैं उनकी और भी ध्यान देने की आवश्यकता है. . . इससे नेहरू जी हाशिये पर नहीं चले जायेंगे.

के द्वारा: Dr S Shankar Singh Dr S Shankar Singh

आदरणीय सिंघोरी जी आज पहली बार आपके ब्लॉग पर आया और पांच सात ब्लॉग पढ़ भी लिए. जागरण की परम्परा है यहां सब बिना मतलब लेख की तारीफ़ बहुत करते हैं . अतः आपके भी बहुत से लेखों की बेवजह तारीफ़ कर दी है आपके ब्लॉग का नाम तो मुक्त विचार है परन्तु वो जातिवाद की विचारधारा से बंधा हुआ है मुझे इस बात का ज्ञान नहीं है " सिंघोरी " किस जाती अथवा समुदाय से हैं परन्तु हर विषय को शूद्रों से जोड़ना और जातिगत बना देना इस बात की और इशारा करता है की शायद आप भी शूद्र समुदाय से हैं . आप जानबूझकर विषयों को जातिगत बनाते हैं रही नरेंद्र मोदी की जाती जिनको आप शूद्र मानते हैं तो शायद आपको ध्यान हो की उनकी जाती पर विपक्ष के लोगों ने बहुत विवाद किया था . वास्तव में वो "घांची तेली" जाती के हैं जो २००१ तक सामान्य जाती में थी और "वैश्य" थी उसको तत्कालीन केंद्र सरकार पिछड़ी जाती में सम्मिलित कर लिया था . कृपया जाती प्रथा से ऊपर उठकर अपनी संकुचित विचारधारा को मुक्त कीजिये

के द्वारा: munish munish

आदरणीय सिंह जी, विस्तृत ज्ञानवर्धक लेख के लिए बधाई स्वीकार करे! संघ प्रमुख के आरक्षण संबंधी बयान को अभी बहुत ज्यादा संज्ञान में नहीं लिया गया है लेकिन इसे लिए जाने की जरूरत है। खास तौर से सामाजिक बदलाव के लिए समर्पित ताकतों को। उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि जैसे-जैसे भाजपा का जोर बढ़ेगा संघ सामाजिक कट्टरता के लिए और ज्यादा मुखर होता जाएगा। मोदी को भी आगे चलकर इसका सामना करना पड़ेगा लेकिन वंचित जातियां बहुसंख्यक हैं। आर एसएस की सोच इससे भी अलग है उसने लो प्रोफाइल में रह कर ( परदे के पीछे ) आज अपनी इतनी ताकत बढ़ा ली है की मोदी जैसे कई मोदियों को ठिकाने लगाने में सक्षम हो गई है - उसका कारन भी है बिना किसी उत्तरदायित्त्व के चुनाव प्रचार से लेकर सरकार के गठन में उसका की बर्चस्व नजर आता है - तमाम सारे कथित हिंदूवादी संघठन उसके कब्जे में है यहां तक की छोटे छोटे मंदिरों का प्रबंध तक आर एस एस और बी जे पी के कार्यकर्ताओं के हाथ में ही रहता है और इसी कारण से सवर्ण जाती सहित पिछड़ों तक में घुसपैठ बना ही ली है जिसका नतीजा हरियाणा और महाराष्ट्र के वर्तमान दृश्य से लगता है इसी प्रकार चौधरी अजित सिंह को भी उसके जातिगत आधार पर एक किले के सामान समझाने वाले क्षेत्र बागपत में भी अपन परचम लहरा ही दिया. अब दलित वर्ग में अति दलित और वंचित समाज की बात करके केवल उस पर कब्जा करने जैसा ही है क्योंकि लोकतंत्र में सत्ता का फैसला करना उनके हाथ में है। इस कारण संघ के लिए यह मोर्चा फतह करना दिवास्वप्न की तरह है। सामाजिक बदलाव की ताकतें इस संक्रमण काल में अपनी भूमिका को पैनेपन से निभाएं ताकि उनके प्रयास पुराने इतिहास में समय-समय पर परिवर्तनों के व्यतिक्रम को न दोहराते हुए अपनी तार्किक परिणति पर पहुंचने में सफल हों।

के द्वारा: s.p. singh s.p. singh

जय श्री राम  हमारे देश में यदि सामान कानून लागो हो तो किसी को कोई इतराज़ नहीं होगा.लेखक ने केवल मंदिरों की बात की मस्जिदों की नहीं समाजवादी राज्य में मुसलमानों का विशेष दर्ज़ा और काननों है.मस्जिदों में लाउड स्पीकर लगाने में कोई इतराज़ नहीं परन्तु मंदिर में लगाने पर दंगा हो जाता है.दुर्गा नागपाल को इसलिए निलम्बित कर दिया गया की उसने अवैद्निक रूप से बन्ने वाली मस्जिद की दिवार गिरा दी थी.वहां अब उसी अवैधनिक मस्जिद को बनवा कर इज्ज़त दे दी गयी.केवल हिन्दुओ के तैवारहो में दंगे फसाद क्यों होते हैं?मुरहाम के जलूस के लिए कोई नियम नहीं परन्तु हिन्दुओं के जलूसो के लिए मुस्लिम विरोध के चलते रास्ता बदल दिया जाता है.गुह्रत में कई मंदिर हटाये गए परन्तु मजारो को हटाने के वक़्त सोनिया गांधी की नीद उड़ गयी.मूर्तियों को जमीन में या तालाबो बे डालने में कोई आपति नहीं परतु जन्नियम दो हो तब विरोध होता है.लेखक एक छद्म सेक्युलर वाले नेता की भाषा बोल रहे है.हिन्दुओ को गुलाम बनाने में यही मानसिकता काम में आयी थी.

के द्वारा: rameshagarwal rameshagarwal

के द्वारा: जयप्रकाश सोमई जयप्रकाश सोमई

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: jlsingh jlsingh

आदरणीय के.पी.सिंह जी, महात्मा गांधी नीति और नैतिकता के युगपुरुष हैं और पंडित नेहरू आज़ाद हुए ग़रीब भारत के विकास-पुरुष, किन्तु पिछले दो सौ वर्षों के भारतीय इतिहास में सच्चे अर्थों में कोई नेता पैदा हुआ तो वह नेता जी सुभाषचंद्र बोस ही हैं | आप ने वर्तमान राजनीति तथा आज के नेताओं के परिप्रेक्ष्य में नेता जी से जुड़े कुछ प्रसंगों को उठाते हुए तुलनात्मक और बहुत जरूरी तथ्यों पर चिंतन किया है -- "इस समय राजनीतिक तौर पर तो भारत संप्रभु है लेकिन नीतियों के स्तर पर उसका नेतृत्व पिछलग्गूपन की तलहटी में पहुंच चुका है। उसे इन नीतियों के आत्मघाती रास्ते से अलग हटने की कोई परवाह नहीं है क्योंकि उसके अंदर हिम्मत की पूरी तरह कमी है। यही कारण है कि भारत का वर्तमान नेतृत्व बात-बात पर इन नीतियों को बदलने के संदर्भ में कहता है कि ग्लोबलाइजेशन के दौर में ऐसा किया जाना संभव नहीं है। निश्चित रूप से आज नेताजी जीवित होते तो भारत इस समर्पणकारी मुद्रा से कुछ अलग हटकर काम करता। आत्मघाती नीतियों को अपनाकर खुदकुशी करने की बजाय जिजीविषा दिखाते हुए ऐसी नई लीक बनाने को तत्पर होता जिससे समूची दुनिया की पीडि़त मानवता को राहत मिलती।" .. हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

के द्वारा: seemakanwal seemakanwal

आदरणीय kpsinghorai जी,आप का लेख मुझे बहुत अच्छा लगा.लोग मोदी जी और राहुल जी की तुलना एक दूसरे से करते हैं,परन्तु हक़ीक़त ये है कि दोनों में कोई तुलना ही नहीं है.दोनों देश के भावी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं,बस यही दोनों में समानता है.मोदी जी अनुभवी राजनीतिज्ञ हैं और अपनी प्रशानिक योग्यता सिद्ध कर चुके हैं,जबकि राहुल जी में कोई प्रशासनिक अनुभव या योग्यता नहीं है.उनके भाषण सुनकर महसूस हो जाता है कि ये लिखा-लिखाया भाषण है और इनकी अपनी कोई व्यक्तिगत विचारधारा नहीं है,केवल गांधी परिवार के एक सदस्य के रूप में पहचान है.आम जनता जो वोट देती है,वो यदि 2014 ई में धर्म,जाति और अपनी गुलाम मानसिकता से ऊपर उठकर वोट देती है तो मोदी जी के हाथों में देश कि बागडोर आ सकती है और देश के चहुंमुखी विकास का रास्ता खुल सकता है.यदि जनता अपने पुराने ढर्रे पर ही चलती है तो महंगाई,भ्रस्टाचार और वर्त्तमान वाली सभी परेशानियों को झेलती-कराहंती रहे.अच्छे लेख के लिए बधाई और शुभकामनाओं सहित.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

आदरणीय के पी सिंह जी, सादर अभिवादन! मरने दीजिये कांग्रेस को अपनी मौत! अभी प्रधान मंत्री सी बी आई के पास जायंगे ... भला तब तक गद्दी कौन सम्हालेगा? इंदिरा गाँधी को भी उनके चाटुकारों ने शिकस्त दी थी राजीव गाँधी को भी अब सोनिया राहुल की बारी है ... यह देश भगवान भरोसे चल रहा है आगे भी भगवान भरोसे ही चलेगा! बहुत ज्यादा उम्मीद भाजपा या मोदी जी से भी नहीं किया जा सकता ही क्योंकि अंतर्कलह यहाँ भी हावी है ... मोदी की सभाओं में भीड़ जुटाने और मंच सजाने में जितने खर्च किये जा रहे है, जाहिर है की उसका खामियाजा भी जनता को ही भुगतना है ... हम सब अपना भड़ास निकाल कर खुद ही शांत हो जायेंगे. खजाने की खोज जारी है!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: SATYA SHEEL AGRAWAL SATYA SHEEL AGRAWAL

के द्वारा: शालिनी कौशिक एडवोकेट शालिनी कौशिक एडवोकेट

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

के द्वारा: Santosh Varma Santosh Varma

आज बेचैन आत्माऐं पत्रकारिता से गायब हो चुकीं हैं। जैसा कि हर उद्योग में होता है मीडिया उद्योग भी पत्रकारिता के लिए प्रोफेशनल तैयार कराने की फैक्ट्री कालेजों के जरिए चला रहा है। पत्रकार बनने के लिए राजनीतिक सामाजिक चेतना की अर्हता अब बेमानी हो चुकी है। अब सम्पादक से लेकर रिर्पोटर तक को अच्छी सेल्समेनशिप आनी चाहिए। वह पाठकों या दर्शकों की बजाय ग्राहक तलाशता है। इसीलिए ज्योतिष, गणित के प्रश्न पत्र की कैसे तैयारी करें, वैलेंटाइन डे पर अपने प्रिय को कौन सा गिफ्ट दें जैसी पत्रकारिता से इतर सामग्री का समावेश प्रचुरता में मीडिया में नजर आने लगा है। विचार और प्रतिबद्धता से अपने को पृथक कर चुकी वर्तमान पत्रकारिता जनतंत्र का चैथा तो क्या पंाचवा छठवां या सौवां खम्भा भी कहलाने लायक नहीं है। सही

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

मनमोहन सिंह ने अपने कार्यकाल में आर्थिक विकास का जो गुब्बारा फुलाया था वह भी पिचक चुका है। दरअसल महारथी मोम का पुतला निकला। मनमोहन सिंह अब हतबुद्घि इंसान के अलावा कुछ नहीं हैं। अंग्रेजी को सर्वोच्च प्राथमिकता देने का नतीजा है वर्तमान विनाशकारी परिस्थितियां। भाषा के साथ संबंधित नियंता समाज का दृष्टिकोण भी उसके अधीन संचालित हो रहे समाज पर आरोपित हो जाता है। एक चीज किसी के लिये हितकारी हो सकती है लेकिन अगर हमारे और उसके हित में प्रतिस्पर्धा का संबंध है तो उसके रिमोट कंट्रोल से हमारा चलना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने की तरह होगा और इस मामले में यही हुआ है। उपनिवेशवादी आर्थिक नीतियों के कर्ताधर्ता अमेरिकी दैत्य के लिये हम उसका निवाला हैं। अंग्रेजी के माध्यम से वह ब्रेनवाश करके हम लोगों को अपने ही हितों के विरुद्घ उपकरण बना रहा है। फरेब पर आधारित अमेरिकी अर्थव्यवस्था नैतिक ढांचे को तहस-नहस करने वाली है। उपभोगवाद का इसका दर्शन हमारे आध्यात्मिक चेतना के विरुद्घ है। फिर भी इसके प्रतिरोध की बात तो दूर अंधानुकरण किया गया। चंद लोगों को अकूत मुनाफा लूटने का अवसर देने का प्रावधान इसमें है जिससे अभाव और गरीबी तो बढ़ेगी ही। नैतिक व्यवस्था से विश्वासघात मौलिक सृजनात्मकता को नष्ट करती है जो उत्पादन के मामले में किसी तरह की विशिष्टता प्रदर्शित करने मेंंहमारी असमर्थता के रूप में परिलक्षित हो रहा है। अब देश को बचाना है तो नैतिक व्यवस्था की बहाली पर ध्यान देना होगा जो वैश्विक निर्भरता को कम से कम करने पर ही संभव है। भूमंडलीकरण के इस युग में यह नहीं हो सकता ऐसा कहने वाले मूर्ख हैं। उस वक्त की चुनोतियाँ और परिस्थितियां अलग थीं ! असली परीक्षा अब होनी है !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

अवैध खनन की समस्या पूरे देश में है पिछले दिनों बेलारी खनन के मामले में बी जेपी के मुख्य मंत्री हटाये गए और इस अवैध खनन के काम में सत्ता पक्ष एवं बिपक्ष दोनों के समर्थक कार्यरत्त हैं यही कारन है की इस समस्या का समाधान नहीं हो रहा है और सरकार को करोड़ों रूपये की रायल्टी से वंचित रहना पड़ रहा है असल में सरकार तो आज माफिया के सहारे ही तो राज कर रही है आज जो लोग सरकार की गिनती पूरी करने के लिए उसका समर्थन कर रहें हैं वे पुराने माफिया लोग ही तो हैं और जब इनको राजनीती से दूर करने की बात सुप्रीम कोर्ट ने की तो इसपर देश की सारी की सारी राजनितिक पार्टियां एकजुट हो गयीं और उसके खिलाफ कानून बनाने की कवायद में जुट गयीं अतः भविष्य में और ज्यादा अपराधी अपने देश की लोकसभा में बैठे मिलेंगे और आप पार्टी देखती रह जाएगी जिस देश में वोट ,नोट के बल पर हासिल किया जाता है उसमें इमानदार आम आदमी पार्टी क्यूँ कर चुनाव जीत पायेगी? पहले नोट के खेल को बंद करना होगा और ऐसा संभव नहीं लगता अतः यह अवैध खनन यु ही जारी रहेगा. एक सार्थक ब्लाग लिखने के लिए आपको बधाई आपका ब्लाग आज जागरण जंक्शन में छपा भी है आपको बधाई

के द्वारा: ashokkumardubey ashokkumardubey

के द्वारा: DR. SHIKHA KAUSHIK DR. SHIKHA KAUSHIK

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के द्वारा: डॉo हिमांशु शर्मा (आगोश ) डॉo हिमांशु शर्मा (आगोश )

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डॉ. वीणा श्रीवास्तव के कृतित्व तथा उनकी सम-सामयिक भूमिका पर अत्यंत प्रभावी प्रस्तुति; साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! ज्योति पर्व की मंगल कामनाएँ ! "डॉ. वीणा श्रीवास्तव की पांच पुस्तकें बहुत ही प्रतिष्ठित प्रकाशनों के माध्यम से बाजार में आ चुकी हैं, जिससे इसकी भूमिका तैयार हुई है। चित्रकूट के लोकोत्सव में उनकी पुस्तक “भारतीय लोक संगीत” का विमोचन हुआ है। इसके फ्लैप में उन्होंने लिखा है लोक जागरण की प्राचीन परम्परा को अक्षुण्य बनाए रखने एवं उत्तरोत्तर विकास के क्रम को सतत प्रवाह देने वाली सांस्कृतिक समृद्धि का पर्याय हमारी लोक विधाओं ने जहां एक ओर सामाजिक एकता को एक सूत्र में बांधे रखने का प्रयास किया है वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय अखंडता की रचनात्मक शक्ति के संरक्षण, संवर्धन के अभाव में लोक विधायें दिन-प्रतिदिन उपेक्षाओं का शिकार होती जा रही हैं।"

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आम आदमी के लिये सटीक कदम यह हो सकते हैं कि शिक्षा, सड़क, इलाज और परिवहन का निजीकरण एकदम बंद किया जाये। जनता के संरक्षक होने के फर्ज के अनुरूप सरकार कहे कि एक समान शिक्षा, एक समान चिकित्सा व्यवस्था होगी और यह खर्चा हम उठायेंगे। अनाज व सब्जी के भावों को नियंत्रित रखने की नियमावली बनाये। इनके भाव सरकार की इजाजत से बढ़ेंगे और कम से कम दो साल तक इनके भाव नहीं बढऩे दिये जायें भले ही पश्चिमी देशों की तरह यहां भी अनाज और सब्जी पैदा करने वाले किसानों को प्रति बीघा के हिसाब से सब्सिडी देनी पड़े। जिसके पास बाइक है उसे एक हजार रुपये का भत्ता सरकार दे तभी उसे हक है कि वह पेट्रोल पर अनुदान पूरी खत्म कर पूरी तरह उसकी कीमत निर्धारण को पूरी तरह बाजार के हवाले करे। दरअसल बाइक को लोग अय्याशी के लिये नहीं चलाते यह साधन उनकी जीविका से जुड़ा है। आम आदमी बाइक से ज्यादा से ज्यादा लोगों से संपर्क कर लेता है और वह अगर एलआईसी का एजेंट है तो उसे जो औसत आमदनी महीने भर में हो रही है वह रोज पेट्रोल की कीमतें बढऩे पर संकुचित होती जायेगी क्योंकि उसके साथ एलआईसी का कमीशन तो बढ़ेगा नहीं। परिवहन किराये में स्थिरता होनी चाहिये।बहुत सटीक लिखा है आपने लेकिन दिक्कत ये है की सरकार हमें अपने मंत्रियों या अपने नातों के चश्मे से देखने की कोशिश करती है जबकि उसे उस आखिरी आदमी की बात सोचनी चाहिए जिसके पास दो वक्त की रोटी का भी इंतज़ाम नहीं है ! बढ़िया लेखन

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

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के पी भाई साब आप ने जो इस लेख में फूलन देवी के पहले जो पहले डकैत हुआ करते थे वो बागी के नाम से जाने जाते थे पान सिंह, मोहर सिंह, माधव सिंह ,तहसीलदार सिंह और उनके समकालीन बागी " डकैत "शब्द पर एतराज किया करते थे । लेकिन समय के साथ साथ अगर बागी डकैत बने तो पुलिस के चरित्र में भी बदलाव आया । आप ने फूलन देवी की जो अपराधिक छवि बयां की इससे यह साबित होता है के अपराधी का कोई जाति,धर्म और मजहब नही होता । फूलन की लड़ाई वर्ग संघर्ष नही था बल्कि ये एक जघंन्य अपराध था जिसको आप ने ३१ साल के बाद बताया वरना माला सेन शेखर कपूर ने बैंडिट क्वीन के माध्यम फूलन को हीरो तो बना ही दिया था । अलीम संजू श्याम अज्जन पप्पू कश्फी

के द्वारा: aleem aleem

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आदरनीय के पी सिंह जी, आपने समस्या तो बताई, अच्छे तरीके से बताई. समाधान नहीं बताया. आपने नीचे जवाब में यह भी कहा है, कि सभी राजनीतिक पार्टियाँ लगभग एक जैसी ही है. अच्छे लोग या तो राजनीति में जाना नहीं चाहते या जाकर या तो उसी रंग में रंग जाते हैं या फिर वापस लौट आते है. मेरा मानना है - जब तक अच्छे इमानदार लोग राजनीति में नहीं आएंगे, समाधान संभव नहीं है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश को न माननेवाली सरकार जब बेरोक टोक चल रही है, फिर लोकपाल क्या करेगा? ... फिर क्या सभी नक्सली बन जाएँ. नक्सलियों के हालत क्या अच्छी है? वे भी कितने बड़े नेता को अपना शिकार बना सके हैं. ज्यादातर बंदी में आम आदमी को ही परेशानी का सबब बनते हैं! SAMASYA RAKHANE KE LIYE DHANYWAD!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" Anil Kumar "Pandit Sameer Khan"

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डॉक्टर साहब, मैं आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूं और मैंने अपने ब्लॉग में सबसे पहले यह लिखा भी है कि पूरे देश की जनता चाहती है कि भ्रष्टाचार मिटे, लेकिन अगर बहुसंख्यक समाज को यह लगता है कि भ्रष्टाचार पर निशाना साधने की आड़ में समता मूलक समाज के नि र्माण की मजबूत हो रही प्रक्रियाओं को कमजोर करने की साजिश निहित है तो अनगढ़ दिखने वाले लोग भी अब पर्याप्त समझदार हैं और उनकी छठी इंद्रिय उन्हें सचेत कर देती है। अन्ना के साथ जो लोग सक्रिय हैं उनके पूर्वज पहले भी नैतिकता की बड़ी-बड़ी बातें करते रहे हैं लेकिन एक अनैतिक और क्रूर व्यवस्था का पोषण उन्होंने किया और व्यक्तिगत स्तर पर अपनी चरित्र की स्वच्छता को अन्यायपूर्ण व्यवस्था को मजबूती देने का हथियार बनाया। सार्वभौम नैतिक मूल्यों में स्वाभाविक रूप से अपेक्षित समाज की आस्था आज भी वर्ण व्यवस्था की चेतना के कारण विगलित होती नजर आती है, जिसके कई उदाहरण दिए जा सकते हैं। उनका उल्लेख न कर मैं सिर्फ यह कहना चाहता हूं कि वर्ण व्यवस्था प्रेरित बहुस्तरीय अन्याय को सबसे पहले मिटाना भ्रष्टाचार सहित हर तरह की अनैतिकता के खिलाफ संघर्ष को अंजाम तक पहुंचाने के लिए बेहद जरूरी है। तथापि आप यह न समझें कि मैं शब्दों को अपने हिसाब तोड़-मरोड़कर आपकी बात का प्रतिवाद करने की मंशा रखता हूं। आपकी प्रतिक्रिया में मेरे लिए प्रोत्साहन है और मैं उसकी तासीर को पूरी तरह ग्रहण करने के बाद आपके प्रति अत्यंत कृतज्ञता ज्ञापित करना चाहता हूं।

के द्वारा: kpsinghorai kpsinghorai

आपका विश्लेषण समस्या की जड़ तक जाता है. फिर भी मुझे कुछ ऐसा आभास होता है कि आपके अनुसार दलित एवं पिछड़ों के उत्थान के लिए भ्रष्टाचार क़ी उपस्थिति आवश्यक है. मैं मानता हूँ वर्ण व्यवस्था हमारी सभी बुराइयों क़ी जड़ में है. इसके खिलाफ अनवरत संघर्ष होना चाहिए. लेकिन पांच हज़ार वर्ष का कोढ़ दस - बीस साल में दूर नहीं हो सकता है. यह संघर्ष सदियों तक चलने वाला है. सभी क्षेत्रों में व्याप्त वर्तमान भ्रष्टाचार तुरंत समाधान मांगता है क्योंकि इसका सम्बन्ध आम जन जीवन के दैनंदिन क्रिया कलापों से है. आम आदमी का जीवन नारकीय बनता जा रहा है.इसमें वर्ण व्यवस्था कहीं नहीं आती है. मुझे ख़ुशी होगी अगर अन्ना वर्णव्यवस्था के विरुद्ध सामाजिक स्तर पर जनांदोलन क़ी शुरुआत करें. लेकिन तब तक इंतज़ार नहीं किया जा सकता. जनता के धैर्य का बाँध टूट रहा है. एक अच्छे आलेख के लिए बधाई

के द्वारा: Dr S Shankar Singh Dr S Shankar Singh

अनिलजी, सबसे पहले तो आपको इस बात का धन्यवाद कि आपने उस निष्पक्ष वैश्विक सर्वे की जानकारी प्रदान की जिसमें कहा गया है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर के पचास सर्वमान्य महापुरुषों में तथागत गौतम बुद्ध और बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर का नाम सामने आया है। बाबा साहेब का देहावसान १९५६ में हो गया था, उस समय उनके परिवार का कोई व्यक्ति राजनीति में प्रभावशाली हैसियत में स्थापित नहीं था। हीन भावना से पीड़ित इस देश में वे लोग जो बडे़ शक्तिशाली नजर आते हैं उन्हें भी यह डर सताता है कि अगर उनकी संतानों या चाहने वालों के हाथ में सत्ता न रही तो दुनिया में वे जैसे ही आंख बंद करेंगे उनकी हस्ती मिट जाएगी। अगर कोई सत्ता उनका नाम नहीं लिवाएगी तो समाज में कोई नाम नहीं लेगा। उनके गणित से बाबा साहब का नाम १९५६ के बाद मिट जाना चाहिए था, लेकिन हुआ क्या। सत्ता ने जिन नामों का गुणगान आजादी के कई दशकों तक किया वे सत्ता परिवर्तन होते ही कहां काफूर हो गए पता नहीं, लेकिन बाबा साहेब ने ३६ साल बाद अमरता की इस देश की पुरानी अवधारणा पर लोगों की आस्था को तब फिर मजबूत किया जब वीपी सिंह के नेतृत्व वाली भारत सरकार ने १९९० में उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न की उपाधि से नवाजा। वीपी सिंह किसी दलित आंदोलन की उपज नहीं थे न ही उनके जनता दल ने दलितों को लामबंद कर कामयाबी का ताना-बाना बुना था। फिर भी उनके माध्यम से भारत सरकार इतने दिनों से बाबा साहेब को अनदेखा करने की गलती का प्रायश्चित करने को मजबूर हुई। यह इस बात का प्रमाण है कि अमरता शरीर से नहीं विचारों से होती है। उसे किसी चालबाजी से हासिल नहीं किया जा सकता। न्याय और मानवता की समर्थक विचारधारा ही अंत में जिंदा रहती है और जो उसका परचम लहराते हैं वे ही अमरता के अधिकारी बनते हैं। यह बात आधुनिक काल में कार्ल मार्क्स और बाबा साहेब के उदाहरण से सही साबित हुई। कार्ल मार्क्स भी सत्ताधारी नहीं था, न ही उसने कोई प्रत्यक्ष क्रांति की थी। उसकी मौत के बाद उसकी विचारधारा के आधार पर उन देशों में क्रांति हुई जहां के लिए वह उतना ही विजातीय था जितना भारत के लिए। मार्क्स जर्मन था लेकिन उसके विचारों पर क्रांति पहले रूस में हुई और उसके बाद चीन में। भारत में समाज सत्ता में जिनका वर्ग स्वार्थ है वे हमेशा सही विचारों से डरते रहे हैं। बात करते हैं वसुधैव कुटुम्बकम् की लेकिन मार्क्स की विचारधारा को किसी मेरिट के आधार पर नहीं मात्र इस आधार पर खारिज कर देते हैं कि चूंकि वह भारत के लिए विदेशी था इसलिए उसकी विचारधारा के प्रति अनुराग रखना देशद्रोह है। इसी तरह बाबा साहेब के विचारों को भी जातिगत घृणा फैलाने वाला ठहराकर उन्हें पढ़ने के पहले ही खारिज कर देने की प्रवृत्ति अपनाई है। अन्यथा बाबा साहेब की विचारधारा ने इतनी विराटता है कि वे तो कई जगह पर सवर्णों के बारे में फैले मिथ का खंडन कर उनका बचाव करते हैं। यही वजह है कि बाबा साहेब ने यह नहीं माना कि जाति का आधार नस्ल है। उन्होंने कहा कि सवर्ण और शूद्र दोनों ही नस्ल के तौर पर एक हैं क्योंकि जाति व्यवस्था तब अस्तित्व में आई जब द्रविड़, सीथियन्स, आर्य व विभिन्न कालों में देश में आईं अलग-अलग नस्लों के बीच रोटी-बेटी का सम्बंध रह चुका था और रक्त के आधार पर उनमें कोई अंतर नहीं रह गया था।

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