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अनिश्चय से न उबरे तब कहीं के न रहेंगे राहुल

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राहुल गांधी के लिए अब करो या मरो की स्थिति है। उन्होंने संगठन और सरकार में अब पहले से ज्यादा सक्रिय भूमिका निभाने का बयान देकर राजनीतिक अटकलों को हवा दे दी है। दरअसल उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के पहले तक राहुल गांधी को लेकर जो चमकदार उम्मीदें संजोई गई थीं वे अब धुंधली पड़ चुकी हैं। पार्टी के अंदर पनप रही माफियाशाही को खत्म कर देने का मामला हो या केंद्र सरकार को एक नई दिशा में ले जाने का, राहुल गांधी कहीं कोई करिश्मा नहीं कर सके। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव को लेकर पार्टी के निहित स्वार्थों ने जिस तरह का आंकलन प्रचारित किया उसके बाद राहुल गांधी ने खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली। वे अपने स्टैंड को सही साबित करने का साहस नहीं दिखा सके। इसकी बजाय अपने प्रयोगों की आलोचना से डरकर वे भूमिगत से हो गए। जनता अपने नायक से इस तरह के पलायन की उम्मीद नहीं करती थी। यही वजह है कि जनमानस ने भी उनकी ओर निहारना बंद कर दिया है।
यदि राहुल गांधी ने अभी जैसा बयान पहले दिया होता तो लोग बल्ले-बल्ले करने लगते, लेकिन अब इस पर प्रतिक्रियाएं बेहद उदासीन नजर आ रही हैं। यह इस बात का इशारा है कि राहुल गांधी ज्यादा सक्रिय भूमिका निभाकर कोई तीर मार लेंगे, ऐसा विश्वास लोगों को नहीं रहा। राहुल गांधी चाहे अपनी शादी का मामला हो या सत्ता संभालने का, हर मोर्चे पर अनिश्चय की स्थिति में नजर आते रहे हैं और इसके चलते अब वे अवसर गंवाने की हालत में पहुंच गए हैं। भ्रष्टाचार और महंगाई के आरोपों से घिरी कांग्रेस अगर लोकसभा का अगला चुनाव डॉ. मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए लड़ने का फैसला करती है तो उसकी बुरी फजीहत हो सकती है। शायद इंटेलीजेंस ब्यूरो और रॉ जैसी एजेंसियों के माध्यम से राहुल गांधी को भी इस बात की जानकारी मिल गई होगी।
वैसे भी राहुल गांधी ने दूसरे कार्यकाल में भी खुद की बजाय प्रधानमंत्री के पद पर मनमोहन सिंह को बरकरार रखने का फैसला करके पर्याप्त अवसर गंवा दिया है। ऐसे में अगर अगले लोकसभा चुनाव के बाद सत्ता परिवर्तन हो गया तो फिर उन्हें पीछे हटना पड़ेगा और जो लोग २००४ से ही उनके प्रधानमंत्री बनकर करिश्मा कर दिखाने के मुगालते में रहे हैं, १५ साल तक अपना सपना पूरा न होने पर पूर्णतया मोहभंग के शिकार हो जाएंगे। इसका असर यह हो सकता है कि फिर राहुल गांधी को हमेशा के लिए प्रधानमंत्री पद भूल जाना पड़े और शायद राजनीति से पलायन तक की स्थिति उनके सामने आ जाए।
कांग्रेस की डूबती नैया को बचाने का अब एक ही जरिया बचा है वो है सत्ता के केंद्र में चेहरा बदलना, राहुल गांधी को पहले लगता रहा होगा कि पार्टी के सीनियर उनके कमउम्र में प्रधानमंत्री बनने को शायद स्वीकार न करें।
सबसे ज्यादा खतरा प्रणव मुखर्जी से था और उनके रायसीना हिल पहुंच जाने से अब यह खतरा पूरी तरह टल गया है। एसएम कृष्णा व दिग्विजय सिंह ने प्रधानमंत्री पद के लिए उनकी अगवानी सी कर दी है ताकि यह संदेश दिया जा सके कि सीनियर भी असहायता से उबरने के लिए राहुल की ओर निहारने को मजबूर हैं। राहुल के लिए इस समय एक अनुकूलता यह भी है कि भाजपा में आडवाणी खारिज हो चुके हैं और नरेंद्र मोदी अब राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी का नेतृत्व करने के लिए बेताब हैं पर नरेंद्र मोदी के खिलाफ अल्पसंख्यकों की भावनाओं के रहते भाजपा की गोट चुनाव में किसी कीमत पर लाल नहीं हो सकती। धर्म निरपेक्ष जमात में महत्वाकांक्षी क्षेत्रीय नेतृत्व राहुल के लिए सबसे बड़ा अड़ंगा था, जिसमें यूपी के ही दोनों शिखर नेता उनके लिए समस्या पैदा करने वाले थे।
संयोग से मुलायम सिंह अपनी उम्र और स्वास्थ्य के कारण अब परिस्थितियों से समझौता करने का मूड बना चुके हैं। अखिलेश को फिलहाल राष्ट्रीय राजनीति करने की कोई जल्दबाजी नहीं है। अन्य राज्यों के क्षेत्रीय नेता चाहे ममता बनर्जी हों, जयललिता हों या फिर करुणानिधि, वे अपने राज्य में तो निरंकुशता चाहते हैं लेकिन केंद्रीय सत्ता को लेकर दावेदारी की उनमें कोई इच्छा नहीं है। कुल मिलाकर समीकरण ऐसे हैं कि राहुल को गैर राजग क्षेत्रीय दलों का पहले से ज्यादा समर्थन हासिल हो रहा है। वंशवाद का आरोप भी अब दरकिनार हो चुका है जिसमें उत्तर प्रदेश में अखिलेश की ताजपोशी उनकी सबसे ज्यादा मददगार है। वंशवाद को पानी पी-पीकर कोसने वाले समाजवादियों के कुनबे में जब अखिलेश की स्वीकार्यता को लेकर कोई विवाद नहीं हुआ, जब आम जनमानस ने भी अखिलेश के लिए उत्साह दिखाया तो अब खतरा कहां बचा है। राहुल को विकल्पहीनता का पूरा लाभ मिल सकता है, इसीलिए राहुल के बयान के बाद यह माना जाना कि वे सिर्फ मनमोहन कैबिनेट में कोई महत्वपूर्ण विभाग लेकर अपने बयान को चरितार्थ करेंगे, राजनीतिक विश्लेषकों की नादानी है।
उन्हें बहुत साफ-साफ समझ लेना चाहिए कि राहुल अगले चुनाव की तिथियां घोषित होने के पहले डॉ. मनमोहन सिंह को प्रतिस्थापित करने वाले हैं। हां, यह जरूर है कि अगर उन्होंने अपनी कमजोरियों व विफलता के कारणों को समझ लिया होगा तो वे सत्ता का इस्तेमाल एक बार फिर अपनी करिश्माई छवि की बहाली के लिए असाधारण कदम उठाने के लिए करेंगे। इसकी पूर्व तैयारी के बतौर उन्हें अनिश्चय की अपनी मानसिकता से निजात पाना होगा।



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
July 21, 2012

देखें राहुल के करिश्मा का असर कहाँ तक होता है ? मनन – मंथन और चिंतन से युक्त आलेख के लिए हार्दिक आभार ! पुनश्च !

    kpsinghorai के द्वारा
    July 22, 2012

    धन्यवाद, वैसे हर कोई अब चिराग के जिन्न का असर देखना चाहता है।


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