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बिहार की राजनीति में साकार हो रहा महाभारत का रूपक

Posted On: 7 Jun, 2015 Others में

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बिहार की राजनीति में महाभारत का रूपक साकार हो रहा है। जदयू और राजद के बीच रविवार को तात्कालिक तौर पर विधान सभा चुनाव गठबंधन बनाकर लडऩे की सहमति भलेे ही हो गई हो लेकिन अभी इसे स्थायी नहीं कहा जा सकता। बिहार में पूरा राजनीतिक परिदृश्य महाभारत के युद्ध के चक्रव्यूह प्रसंग जैसा है जिसमें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अभिमन्यु की तरह घिरे हुए हैं। हालांकि उनके राजनीतिक अस्तित्व को मेटने पर आमादा नीतीश ने यह भी साबित कर दिया है कि उन्हें इतनी आसानी से असहाय नहीं किया जा सकता। मुलायम सिंह यादव के आवास पर होने वाली बैठक के एक दिन पहले पूरा पटना महानगर नीतीश के फोटो लगे पोस्टरों से पाट दिया गया। गठबंधन में एक बड़ी समस्या मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश को प्रोजेक्ट कर चुनाव लड़ा जाना चाहिए या नहीं इसको लेकर बनी हुई है। पटना में लगे पोस्टरों को लेकर नीतीश के समर्थकों ने कहा कि बिहार की जनता स्वाभाविक रूप से उन्हें अपने नेता के रूप में देखती है इसलिए अकेले उनके पोस्टर लगाने में कोई अजीब बात नहीं है। जाहिर है कि नीतीश आसानी से चुनाव के पूर्व उन्हें गठबंधन के मुख्यमंत्री के बतौर पेश किए जाने के दावे पर समझौता नहीं करेंगे। हालांकि रविवार की बैठक में फिर इसका एलान नहीं हुआ लेकिन इसका मतलब कहीं से यह नहीं है कि नीतीश ने स्थितियों से समझौता कर लिया है।
नीतीश ने लोक सभा चुनाव के समय भाजपा द्वारा नरेंद्र मोदी को राजग की ओर से प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित करने पर उसके गठबंधन से अपनी पार्टी को बाहर करने का एलान कर दिया था जबकि जदयू अध्यक्ष शरद यादव जो कि राजग के संयोजक की जिम्मेदारी भी संभाले हुए थे इस तरह का फैसला नहीं करना चाहते थे। उन्हें मजबूरी में नीतीश के पीछे चलना पड़ा क्योंकि वे नेताओं के बीच गोटियां फिट करने के हुनर में तो माहिर हैं लेकिन धरातल पर उनका कोई वजूद नहीं है। इस फैसले के चलते जब लोक सभा चुनाव में जदयू को राज्य में करारी विफलता का सामना करना पड़ा तो उन्होंने राजद से अलग होने के निर्णय की चूक का ठीकरा उनके सिर पर फोड़ा जाता इसके पहले मुख्यमंत्री पद त्यागने और जीतनराम माझी को अपनी गद्दी सौंपने का एलान कर दिया। यह काम भी शरद यादव की मर्जी के मुताबिक नहीं था। उन्होंने फिर एक बार खून का घूंट पिया और नीतीश के फैसले को मजबूरी में मान्य कर लिया। इन दोनों फैसलों की वजह से रूढ़ हो चुकी तीसरी शक्ति की राजनीतिक दुनिया में नीतीश कुमार ने केेंद्र बिंदु के रूप में अपना स्थान आरक्षित करने का एक सफल दांव खेल दिया था पर किस्मत ने उनका साथ नहीं दिया।
सर्वाधिक दलित जाति के नेता को मुख्यमंत्री बनवाकर सामाजिक न्याय की राजनीति के धरातल पर मसीहाई का श्रेय लूटने का जो तानाबाना उन्होंने बुना था घटनाओं के आगामी संयोग ने उसे बिखेर दिया। जीतनराम माझी ने हार्डकोर दलित लाइन अख्तियार करते हुए मूल भारतीयों बनाम बहिरागत आर्यों के बीच भारतीय समाज में जारी द्वंद्व की अवधारणा को हवा देनी शुरू की तो नीतीश को अगले चुनाव में सामने आने वाले बड़े खतरे का आभास हो गया। उन्होंने जीतनराम को संयम से राजनीति करने का संकेत भेजा। शुरू में नीतीश के प्रति पूरी तरह निष्ठावान जीतनराम माझी ने हां तो कह दी लेकिन एक ओर तो वे आदत से मजबूर थे और दूसरी ओर शरद यादव को इसमें नीतीश को हद में करने की गुंजाइश दिखी इसलिए उन्होंने शातिर ढंग से जीतनराम को उकसाना शुरू कर दिया। जदयू के प्रधान महासचिव केसी त्यागी ने जीतनराम को जब यह संकेत दिया कि पानी अब सिर से ऊपर हो रहा है तो शरद यादव को भी अध्यक्ष होने के नाते उन्हें आगाह करना चाहिए था लेकिन उन्होंने साजिशी टालमटोल करके जीतनराम के अंदर बगावत को हवा दी। अंततोगत्वा नौबत यहां तक पहुंची कि जीतनराम आसानी से नीतीश कुमार के लिए पद छोडऩे को तैयार नहीं हुए। काफी फजीहत के बाद नीतीश कुमार उनसे पिंड छुड़ाकर फिर खुद गद्दी संभालने में कामयाब हो पाए।
जनता दल परिवार के महाविलय की भूमिका नीतीश कुमार ने ही रची थी लेकिन यह उनके गले की हड्डी बन गई। मुलायम सिंह यादव लालूू और शरद तीनों के बीच नीतीश को बौनसाई करने की दुरभिसंधि हो गई। जनता दल परिवार का महाविलय इसी नाते टल गया। गठबंधन की बात आई तो लालू ने यह जानते हुए भी कि जीतनराम की बातचीत भाजपा से चल रही है नीतीश को चिढ़ाने के लिए उन्हें भी गठबंधन में लाने की वकालत शुरू कर दी। कायदे से शरद को इसका विरोध करना चाहिए था लेकिन वे अभी तक इस मामले में मूकदर्शक बने हुए हैं। इतना ही नहीं जब लालू ने गठबंधन में राजद के लिए बहुत अधिक सीटों की मांग पेश कर दी और यह भी कहा कि किसी को पहले से मुख्यमंत्री के रूप में प्रस्तुत करने की कोई जरूरत गठबंधन के लिए नहीं होनी चाहिए तब भी शरद यादव ने पार्टी के अधिकार के लिए उनका प्रतिवाद और प्रतिरोध करने की कोई आवश्यकता नहीं समझी। इन पैंतरों से चिढ़कर मुलायम सिंह के घर हुई पिछली बैठक से नीतीश किनारा कर गए। इसके बाद गठबंधन की ओर से कराए गए दो बड़े जातिगत सम्मेलनों से भी वे नदारद रहे। नीतीश बराबर यह सिग्नल भेज रहे थे कि अपने हितों पर गठबंधन उन्हें स्वीकार नहीं होगा। दूसरी ओर जदयू अध्यक्ष की हैसियत सेे शरद यादव लालू के साथ हर जगह मौजूदगी रखकर ऊहापोह की स्थिति पैदा कर रहे थे। उनके अध्यक्ष होने के नाते नीतीश का प्रतिरोध पार्टी की बजाय व्यक्तिगत विमुखता तक सिमट रहा था। ऐसे में नीतीश ने कांग्रेस के प्रति अंदर ही अंदर पींगें बढ़ाईं और राहुल का आधिकारिक बयान आया कि अगर जदयू व राजद अलग-अलग चुनाव लड़े तो कांग्रेस लालू की बजाय नीतीश से गठबंधन करेंगे। रविवार को दिल्ली में मुलायम सिंह के घर उपस्थित होने के पहले भी नीतीश ने राहुल से मुलाकात की जिसका रणनीतिक संदेश साफ है।
भाजपा के मुख्य निशाने पर नीतीश हैं। जीतनराम माझी की अंतिम क्षणों तक कोशिश नीतीश को दलितों के बीच सबसे बड़े खलनायक के रूप में पेश करने की है। उनकी कैबिनेट में भी आगामी नेतृत्व के लिए उनकी स्वीकार्यता पर रमई राम जैसे लोगों के माध्यम से प्रश्नचिह्नï लगाया जा रहा है। यह सब आखिर महाभारत में चक्रव्यूह में घिरे अभिमन्यु की तरह उनकी गत करने की धमाचौकड़ी नहीं है तो और क्या है।

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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rameshagarwal के द्वारा
June 8, 2015

जय श्री राम बिहार में दिल नहीं मिले और न मिलेगे केवल ऊपर सुलहनामा हुआ जिसमे लालू ने नितीश को मुख्य मंत्री पद के नाम पर सहमती बन गयी परन्तु दोनों दल कितन सहयोग करेंगे  और लालू के दल में बगावत नहीं होगी ये भविष्य बतेयेगा.विश्लेषण बहुत अच्छा.


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