मुक्त विचार

Just another weblog

474 Posts

426 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 11660 postid : 909760

कौन है आस्तीन का सांप

Posted On: 16 Jun, 2015 Others में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

आईपीएल के पूर्व चेयरमैन ललित सूरी को वाणिज्यिक दस्तावेज दिलाने में सहयोग करने की वजह से विदेश मंत्री सुषमा स्वराज जिस विवाद के घेरे में आ गई हैं वह तेजी से तूल पकड़ रहा है। कांग्रेस ने इस मुद्दे की आड़ में आक्रामक पारी खेलते हुए भाजपा और केेंद्र सरकार की नाक में दम कर दिया है। भूमि अधिग्रहण कानून में मोदी सरकार के प्रस्तावित संशोधन को लेकर कांग्रेस के विरोध को भारी कामयाबी मिली। कांग्रेस ने मोदी सरकार का लय ताल इस मुद्दे पर पूरी तरह बिगाड़ दिया जिससे जहां मोदी का अति आत्मविश्वास हिल गया वहीं हताशा के अतल गर्त में समा चुकी कांग्रेस को नए सिरे से उठ खड़े होने का मौका मिला है। कांग्रेस में यह विश्वास फिर वापस आया है। यही वजह है कि ललित सूरी के मामले में कांग्रेस के हमले में सुषमा स्वराज को सपा का सहयोग मिल जााने के बावजूद कोई कमी नहीं आई वरना होना यह चाहिए था कि धर्मनिरपेक्ष खेमे में ही समर्थन न मिलने से उसका मनोबल गिर जाता। कांग्रेस बेहद सधे ढंग से पैंतरेबाजी कर रही है और अब यह निष्पक्ष प्रेक्षकों को भी लगने लगा है कि मोदी अपराजेय नहीं हैं। अगर कांग्रेस इसी तरह पारी खेलती रही तो देश का राजनीतिक परिदृश्य बदल सकता है। लोक सभा चुनाव में मान्यता प्राप्त विपक्ष के लायक भी सीटें हासिल न करने वाली कांग्रेस ऐसी स्थिति में सरकार पर हावी होकर दिखा सकती है।
बहरहाल यह एक अलग माजरा है। ललित मोदी मामले में भाजपा के अंदर चल रही अंतर्कलह के नासूर का मवाद भी कहीं न कहीं बाहर फूट पड़ा है। कीर्ति आजाद ने सुषमा स्वराज पर हुए हमले को लेकर बयान दिया है कि कांग्रेस को इस मुद्दे की जानकारी कराने में आस्तीन के सांपों का ही हाथ है। शत्रुघन सिन्हा ने भी उनके तर्क का समर्थन किया। सुषमा स्वराज और शत्रुघन सिन्हा को लालकृष्ण आडवाणी का समर्थक माना जाता है। लोक सभा चुनाव में पार्टी के चेहरे के रूप में लालकृष्ण आडवाणी को नेपथ्य में ढकेल कर मोदी को आगे लाने की मुहिम जब चल रही थी तो पार्टी में खुलेआम लाबिंग शुरू हो गई और उस समय सुषमा स्वराज व शत्रुघन सिन्हा लालकृष्ण आडवाणी के साथ खड़े हो गए थे। मोदी ऊपरी तौर पर बड़प्पन का नाटक चाहे जितना करें लेकिन यह असलियत उजागर है कि उन्हें अपना विरोध करने वाला कभी बर्दाश्त नहीं होता। सुषमा स्वराज व शत्रुघन सिन्हा से ऊपरी तौर पर मोदी ने प्रधानमंत्री बन जाने के बाद पुरानी बातें भूलकर आत्मीय संबंध बनाने का स्वांग जरूर रचा लेकिन कई प्रसंग ऐसे रहे जिसमें यह बात जाहिर हो ही गई कि मोदी को अभी भी दोनों के प्रति बहुत अधिक कसक है।
बहरहाल कीर्ति आजाद ने सुषमा स्वराज के खिलाफ षड्यंत्र के लिए आस्तीन का सांप कहकर भाजपा के ही जिस नेता की ओर इशारा किया उसके नाम को लेकर तत्काल ही अटकलबाजियां शुरू हो गई थीं। इसमें सबसे ज्यादा चर्चा वित्त मंत्री अरुण जेटली के नाम की रही। इसी की प्रतिक्रिया थी कि आज अरुण जेटली ने राजनाथ सिंह के साथ संयुक्त पत्रकार वार्ता की जिसमें आभास कराया कि पूरी सरकार सुषमा स्वराज के साथ खड़ी है। इसके बावजूद इस प्रश्न की अनुगूंज तेज होती जा रही है कि आखिर पीएमओ क्यों सुषमा स्वराज के बचाव के लिए आगे नहीं आ रहा। इसी बीच कहा गया कि अब हो सकता है कि पीएमओ इस मामले में अपनी उदासीनता को तोड़कर सुषमा स्वराज के बचाव के बहाने कांग्रेस पर जवाबी हमले के लिए बाध्य हो जाए क्योंकि कांग्रेस सुषमा स्वराज को किनारे करके ललित मोदी को वाणिज्यिक दस्तावेज उपलब्ध कराने के मामले में प्रधानमंत्री को सीधे घसीटने पर जोर लगा रही है। कांग्रेस का कहना है कि ललित मोदी के प्रति असली अनुरक्ति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की है जिसकी वजह से उनके इशारे पर सुषमा स्वराज को मानवीय आधार पर ललित मोदी को पुर्तगाल के लिए वाणिज्यिक दस्तावेज उपलब्ध कराने में सहयोग करने के अनुरोध का पत्र एक ब्रिटिश सांसद को लिखना पड़ा। आज कांग्रेस प्रवक्ता आनंद शर्मा ने कहा कि इसमें मानवीय आधार भी नहीं था क्योंकि मोदी की कैैंसर ग्रस्त पत्नी का पुर्तगाल में कोई इलाज नहीं हुआ जबकि उन्होंने प्रचारित यह कराया था कि ललित मोदी की पत्नी की हालत बेहद संगीन है और उन्हें कैैंसर के निदान के लिए पुर्तगाल में इलाज कराने का मशविरा दिया गया है।
मोदी सरकार का एक वर्ष पूरा होने पर कई मंत्री और भाजपा के शीर्ष नेता संघ प्रमुख मोहन भागवत से मिलने पुणे गए। इनमें केेंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह भी शामिल थे। राजनाथ सिंह ने बताते हैं कि उनसे भाजपा अध्यक्ष ललित मोदी के रवैए की शिकायत की। राजनाथ सिंह ने संघ दरबार में अमित शाह के खिलाफ जबरदस्त लाबिंग कराई है। उन्होंने संघ का ध्यान मोदी की सर्वसत्तावादी मानसिकता की वजह से भाजपा में सामूहिक नेतृत्व और संवाद की टूटती परंपरा की ओर दिलाया है और इसके दूरगामी खतरों से भी अवगत कराया है। संघ पोषित पार्टी व्यक्तिवादी होगी तो विचारधारा से भी उसका संबंध विच्छेद हो जाएगा। इस तर्क को राजनाथ सिंह ने संघ के दरबार में उछाला है और संघ इससे मुतमईन भी हुआ है। इसके इलाज के बतौर अमित शाह को हटाकर जनवरी के बाद भाजपा के अध्यक्ष की बागडोर मोदी के समानांतर कद के नेता को सौंपने का मशविरा संघ प्रमुख को दिया गया है और वे इस पर गंभीरता से विचार भी कर रहे हैं। वैकल्पिक नामों में सर्वोपरि नाम खुद राजनाथ सिंह का है। इससे जाहिर है कि मोदी लगातार पार्टी हलकों में जितना शक्तिशाली हो रहे हैं उतना ही अंदर ही अंदर उनके विरोध की खिचड़ी भी तेजी से पक उठी है। मोदी अपनी कार्यशैली से खुद ही इस विरोध को हवा देने की भूमिका जाने अनजाने में निभा रहे हैं। स्वयं सूचना प्रसारण मंत्रालय संभाल चुकी सुषमा स्वराज ने जब सरकारी संचार माध्यमों में अपनी एक महत्वपूर्ण प्रेस कांफ्रेंस को कवर न किए जाने की शिकायत प्रधानमंत्री से दर्ज कराई थी तभी जाहिर हो गया था कि बहुत प्रभावशाली स्तर से उन्हें बौनसाई करने की साजिश चल रही है। मोदी पार्टी और सरकार में अपनी प्रतिद्वंद्विता में रहे हर नेता का कद छांटने में लगे हैं। इससे हर नेता उनसे सशंकित हो गया है और सरकार व पार्टी में दरबारी षड्यंत्र का बोलबाला बढऩे पर आ गया है। सुषमा स्वराज को लेकर चल रहे विवाद में पार्टी की इस अंतर्कलह का कोण किस हद तक काम कर रहा है इस पर अभी और पुख्ता पड़ताल की जरूरत है। बहरहाल यह संयोग नहीं है कि हर समय सरकारों और करिश्माई नेताओं ने तभी मात खाई जब यह लग रहा था कि अब लंबे समय तक कोई उनसे मुकाबला करने की हालत में नहीं बचा है। बंगला देश के युद्ध के समय प्रतिपक्ष के दिग्गज नेताओं तक द्वारा दुर्गा के अवतार के रूप में नवाजी गई इंदिरा गांधी संसद के उसी कार्यकाल में ढेर होने को अभिशप्त हो गईं। 1984 के चुनाव में राजीव गांधी को लोक सभा में भूतो न भविष्यतो बहुमत मिला था तब भविष्यवाणी की गई थी कि कम से कम दो दशक तक राजीव गांधी को कोई प्रधानमंत्री पद से नहीं हिला पाएगा। विपक्ष के सारे नेताओं की राजीव गांधी की योजना से 1984 के लोक सभा के चुनाव में शर्मनाक पराजय हुई थी। इस कारण यह विश्वास और मजबूत हो गया था। कहा जा रहा था कि पहले विपक्ष में उनके सामने खड़े होने के लिए कोई नया नेता तैयार हो तब कहीं जाकर प्रतिद्वंद्विता की स्थिति बने। फिर यह विचार करने की स्थिति आए कि क्या उसका विरोध राजीव गांधी की सत्ता को उखाड़ पाएगा लेकिन रातोंरात कांग्रेस में से ही वीपी सिंह मजबूत विपक्षी नेता बनकर उभरे और कुछ ही महीनों के अंतराल में उन्होंने ऐसी स्थिति तैयार कर दी कि अगले चुनाव में राजीव गांधी को मुंह के बल गिरना पड़ा। मोदी के शुभचिंतकों को इतिहास की इन नजीरों को अपने जहन में संजो कर रखना चाहिए।

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (2 votes, average: 3.50 out of 5)
Loading ... Loading ...

2 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
June 23, 2015

आपने एक जगह लिखा है- “राजनाथ सिंह ने बताते हैं कि उनसे भाजपा अध्यक्ष ललित मोदी के रवैए की शिकायत की।” आपने ललित मोदी को भाजपा अध्यक्ष बना दिया है ! लेख में आपने भाजपा के प्रति अपनी मानसिक कुंठा व्यक्त की है, जबकि आज के समय में भाजपा की मोदी सरकार अब तक की सबसे बेहतरीन सरकार है और शानदार ढंग से कार्य कर रही है ! बेस्ट ब्लॉगर आफ दी वीक चुने जाने की बधाई !

jlsingh के द्वारा
June 22, 2015

आपके गहन अध्ययन और मनन के बाद जो विचार निकालकर सामने आते हैं, निश्चित ही विचारणीय होते हैं. योग से जोड़ने की कोशिश जारी है, अमरीका में योगदिवस के दिन योग कार्यक्रम के लिए सुषमा जी को कमान मिला. मीडिया से दूर रखने का सिलसिला जारी है, पर अंतर्कलह उभरकर सामने आने लगा है. आपके हा ब्लॉग पठनीय और मननीय होते है. बहरहाल साप्ताहिक सम्मान की बधाई!


topic of the week



latest from jagran