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...और लालकृष्ण आडवाणी द्वारा फोड़ा गया इमरजेंसी बम

Posted On: 20 Jun, 2015 Others में

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इंडियन एक्सप्रेस को इमरजेंसी के बावत लालकृष्ण आडवाणी द्वारा दिए गए इंटरव्यू ने सत्ता शिविर में बम गिरने जैसा प्रभाव पैदा किया है। हालांकि आडवाणी जब इसे लेकर बवंडर तेज होने लगा तो पैंतरा बदलकर सत्ता शिविर को मलहम लगाने में भी जुट पड़े हैं। इंदिरा गांधी द्वारा लगाई गई इमरजेंसी के लिए सोनिया और राहुल से अफसोस जताने की अपेक्षा करके उन्होंने सत्ता शिविर को संतुष्ट करने का प्रयास किया है। इसके पहले उन्होंने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को मिलने को समय दे दिया था जिससे सत्ता शिविर में जबरदस्त बेचैनी पूर्वानुमानित ही थी क्योंकि लालकृष्ण आडवाणी के इंटरव्यू के बाद केजरीवाल ने उनकी बात की तायद करते हुए फुर्ती से यह बयान जारी किया था कि शायद वर्तमान सत्ता प्रतिष्ठान ने दिल्ली से इमरजेंसी का रिहर्सल भी शुरू कर दिया है। केजरीवाल से इसके बावजूद अगर आडवाणी मिलते तो यही संदेश जाता कि इमरजेंसी के बारे में मोदी सरकार को निशाने पर रखकर ही उन्होंने कई अर्थों वाली अभिव्यक्ति की थी।
फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि लालकृष्ण आडवाणी जैसा कि अब जाहिर कर रहे हैं का मन मोदी और उनकी सरकार के प्रति बहुत साफ है। उन्हीं के द्वारा प्रमोट किए गए मोदी आज उन्हें लांघकर आगे बढ़े। इसकी कसक आडवाणी को होना लाजिमी है और मोदी ने इस कसक को मिटाने की बजाय बढ़ाने का ही काम किया है तो आडवाणी की तल्खी खत्म हो जाए यह कैसे मुमकिन है। देखा जाए तो आडवाणी के साथ संघ परिवार ने काफी नाइंसाफी की है। 1984 के चुनाव में जब भाजपा को लोक सभा में मात्र दो सीटें मिली थीं और अटल बिहारी वाजपेई जैसे दिग्गज को भी पराजय का मुंह देखना पड़ा था तब लगा था कि इस नवजात पार्टी को राष्ट्रीय राजनीति के केेंद्रबिंदु में आने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ेगा लेकिन आडवाणी ही थे जिन्होंने राम रथ यात्रा के माध्यम से भले ही लोगों में सांप्रदायिक भावनाएं भड़का कर काम किया हो पर वे भाजपा को रातोंरात सिफर से शिखर की ओर अग्रसर करने में सफल रहे। इस तरह असली तौर पर भाजपा के शिल्पी लालकृष्ण आडवाणी को जब मौका आया तो प्रधानमंत्री पद के लिए उनसे सब्र करने को कह दिया गया। संघ ने उन अटल बिहारी वाजपेई को आडवाणी के मुकाबले चुना जो स्वयं सेवक होते हुए भी अपने कद को विराट बनाने के लिए उसकी रीति नीति पर समय समय पर एतराज जताने से नहीं चूके। उनकी सुनियोजित राजनीति का ही नतीजा था कि सांप्रदायिकता विरोध की वजह से जिन पार्टियों को संघ से एलर्जी थी वे व्यक्तिगत रूप से अटल जी की तारीफ भी करती थी। सार्वभौम स्वीकृति के इसी श्रंृगार को तराश कर अटल जी ने अपने नेतृत्व में केेंद्र में पहली बार भाजपा की सरकार बनाने की भूमिका तैयार की। किसी जमाने में लालकृष्ण आडवाणी अटल जी के निजी सचिव रहे थे इसलिए उनके नाम पर अपनी महत्वाकांक्षा का त्याग करने में आडवाणी को ज्यादा कष्ट नहीं हुआ और फिर यह भी नजर आ रहा था कि आखिर अटल जी के बाद तो उन्हीं का नंबर है। इसी बीच भाजपा सत्ता से बाहर हो गई और उस दौरान एक बात बड़ी प्रमुखता से प्रचारित हुई कि अगर भाजपा को सत्ता में वापसी करनी है तो कट्टर चेहरे यानी आडवाणी को पीछे रखकर ही यह काम संभव है। प्रधानमंत्री के रूप में जब अपनी इस छवि को आडवाणी ने बहुत बड़ी बाधा के रूप में देखा तो उन्होंने छवि बदलने के लिए जिन्ना का ऐसा पुनर्मूूल्यांकन कर दिया कि संघ परिवार में हलचल मच गई। इसके बाद संघ परिवार की नजरों में वे इतने नीचे चले गए कि उन्हें प्रधानमंत्री पद की दौड़ से बाहर करने के लिए संघ परिवार ने भाजपा में कामराज फार्मूला लागू करने की जिद ठान दी। भाजपा में इसे लेकर भारी विग्रह चला। आडवाणी ने मजबूती के साथ इसका प्रतिवाद किया लेकिन चौदहवीं लोक सभा के चुनाव के पहले जब देश के राजनीतिक माहौल से यह एकदम स्पष्ट हो गया कि अब की बार सत्ता शिखर पर फिर भाजपा का ही सूरज चमकेगा तो संघ ने निर्णायक तौर पर आडवाणी को खारिज करते हुए पार्टी के नए चेहरे के रूप में नरेंद्र मोदी को स्थापित करने का फरमान सुना दिया। आडवाणी ने इसे अपनी बहुत बड़ी जलालत के बतौर संज्ञान में लिया लेकिन स्थितियां इतनी बदल चुकी थीं कि आडवाणी समझ गए कि अब कुछ नहीं हो सकता। इस बीच मोदी ने भी अभिनय किया जैसे चुनाव की बातें भूलकर वे अपने जीवन में आडवाणी के आदरणीय स्थान को निभाने के लिए तैयार हो चुके हैं। आडवाणी में भी इसके बाद बहुत कुछ स्थिरता आ गई थी पर जब उन्हें भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में समापन भाषण से वंचित किया गया और मोदी सरकार के एक वर्ष के कार्यकाल को लेकर हुई भाजपा की सभा से दूर रखा गया तो आडवाणी ने महसूस किया कि मोदी पार्टी में उन्हें जीते जी विलुप्त करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। इमरजेंसी को लेकर उनका बयान इसी का नतीजा था जिसकी मोदी शिविर में सांप सूंघ जाने जैसी प्रतिक्रिया हुई। कहावत है कि हाथी मर भी जाए फिर भी सवा लाख का होता है। आडवाणी का राजनीतिक अनुभव इतना लंबा है कि लोग उन्हें कितना भी निपटा दें पर जौहर दिखाने के लिए उनके पास एक न एक तीर तो बचा ही रहेगा।
बहरहाल आडवाणी के इमरजेंसी संबंधी बयान का एक आयाम भाजपा में छिड़े आंतरिक संघर्ष से जुड़ा है जिसमें औपन्यासिक नाटकीयता के तत्व निहित हैं लेकिन दूसरा सिरा ज्यादा महत्वपूर्ण है जो राजनीति के तात्विक दर्शन से ताल्लुक रखता है। इसकी शुरूआत इस बहस से की जा सकती है कि क्या किसी जनवादी ताकत को लोकतंत्र के मौजूदा स्वरूप को बचाने की दम भरनी चाहिए। देश की वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था रूपगत तौर पर तो लोकतांत्रिक है लेकिन वास्तविक तौर पर यह व्यवस्था क्या है इसकी पड़ताल कुछ और ही बात कहती है। भारतीय लोकतंत्र ऐसी दिशा में चल पडऩे को मजबूर हो गया कि यह माफिया तंत्र, भ्रष्ट तंत्र, कुलीन तंत्र, अराजक तंत्र और फासिस्ट तंत्र का पर्याय दिखने लगा है। इस तंत्र के जितने कानून और सुविधाएं हैं उनसे लोक या जन का तो संरक्षण होता नहीं है। यह तंत्र उन वर्गों की सेवा लोक या जन के हितों की कीमत पर कर रहा है जिन्होंने अपने को समानांतर सत्ता के रूप में स्थापित कर लिया है। इन सत्ताओं के आगे राजनीतिक सत्ता लाचार है बल्कि उनकी वंदना की स्थिति में है। ताजा प्रसंग ललित मोदी गेट का है जिसमें ईडी द्वारा वांछित आर्थिक अपराधी की सरकार के नुमाइंदे किसी धार्मिक कर्तव्य की तरह मदद करते नजर आए। अटल बिहारी वाजपेई की सरकार में हाशिए की मीडिया में यह खबरें छपती रही कि धीरू भाई अंबानी का रुतबा इस कदर स्थापित हो गया है कि जब वे दिल्ली आते हैं तो पीएमओ का आला अधिकारी एयरोड्रम पर उनकी अगवानी के लिए पहुंचता है। अंबानी की नजर जिस पर टेढ़ी हो जाए वह अफसर पीएमओ में रह नहीं सकता। धीरू भाई अंबानी के पुत्र मुकेश अंबानी की हैसियत भी कमोवेश इसी तरह की है जिसको नुमाया तौर पर उस बहुचर्चित तस्वीर में बहुत स्पष्टता से देखा गया जिसमें देश के प्रधानमंत्री उनकी पत्नी का अभिवादन कोर्निश बजाने की मुद्रा में करते दिखे। अंबानी एंड संस कोई महापुरुष नहीं हैं। इनके सारे धंधे संदिग्ध रहे हैं और हेराफेरी से सरकारी कानूनों को बधिया बनाकर इन्होंने वह ताकत हासिल कर ली कि जो सरकार इनके खिलाफ कार्रवाई करना चाहती थी रातोंरात उसका तख्ता पलट हो गया। यह लोकतंत्र गुंडों, बाहुबलियों और कानून को अपने पैरों की जूती समझने वालों के लिए सत्ता के द्वार खोलने की कुंजी बन गया है। राज्यों में कैसे लोग सत्तारूढ़ हो रहे हैं यह उस लोकतंत्र का नमूना है। इसमें लोक की हैसियत तो यह है कि अगर उसका प्रियजन सरे चौराहे मारा जाए तो भी गारंटी नहीं है कि उसकी रिपोर्ट दर्ज हो जाएगी। उसका इलाज नहीं हो सकता। उसके बच्चे पढ़ नहीं सकते। उसे बुनियादी अधिकार तक हासिल नहीं हैं। उत्थान के अवसरों की तो बात क्या की जाए मौलिक अधिकार केवल बदमाशों के लिए हैं क्योंकि इनके लिए सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने की जरूरत पड़ जाए तो लाखों रुपए की फीस देने की सक्षमता व्यक्ति की होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का वकील तो बात करने तक की फीस एक लाख रुपया चाहता है। भ्रष्टाचारियों के लिए यह लोकतंत्र अभ्यारण्य साबित हो रहा है और भ्रष्टाचार बढऩे का मतलब है वंचितों के लिए जीने तक के दरवाजे बंद हो जाना। क्या ऐसे फर्जी और फरेबी लोकतंत्र की रक्षा की सौगंध आम आदमी को लेनी चाहिए और क्या कोई ऐसा तरीका है कि इस लोकतंत्र को बदलकर सही पटरी पर लाने का काम सामानंतर सत्ताओं की नाक में नकेल डाले बिना हो जाए। वर्तमान में जबकि सत्ता के सारे पिलर चाहे वह विधायिका हो कार्यपालिका हो न्याय पालिका हो और यहां तक कि अघोषित चौथा पिलर मीडिया भी समानांतर सत्ताओं का बंधक है। उन्हें नियंत्रित करने का प्रयास इस लोकतंत्र के तहत किया जाना किसी भी तरह से संभव नहीं है। इन पर नियंत्रण होने तक लोकतंत्र को अस्थाई तौर पर स्थगित करने के लिए इमरजेंसी के विकल्प के अलावा कोई चारा नहीं है और जो इसे नकारता है उससे बड़ा फरेबी कोई नहीं हो सकता। लालकृष्ण आडवाणी जिस वर्ग समाज से आए हैं उस वर्ग सत्ता की ऐसे जालिम लोकतंत्र के प्रति भक्ति लाजिमी है लेकिन हम जैसे लोग इस दैत्य तंत्र को सहन करना गवारा नहीं कर सकते।
इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी जिन परिस्थितियों में लागू की उसके बारे में आधा अधूरा सच कहा जा रहा है और ऐसा कहने के पीछे आडवाणी टाइप के लोगों का माइंड सेट है। इनकी वर्ग चेतना के चश्मे से इंदिरा गांधी की इमरजेंसी का एक पक्षीय चित्रण ही होगा जबकि उस समय के सारे तथ्यों को रोशनी में इस परिघटना का मूल्यांकन किया जाए तो अलग ही निष्कर्ष उभरते हैं। पं. जवाहर लाल नेहरू ने लोकप्रियता वाद और आदर्श वाद के तहत तत्कालीन व्यवस्था के स्वरूप को जनता के लिए कुछ राहत दायक बनाने की गरज से ऐसे कदम उठाए जिससे उस समय की समानांतर सत्ताओं से कांग्रेस का टकराव हो गया। जमींदारी उन्मूलन के उनके फैसले की वजह से जाति आधारित इस देश में जो कौमें कांग्रेस से नाराज हुईं उनमें सबसे ऊपर ठाकुर रहे तो बिहार में जहां जमींदारी कायस्थों के हाथ में थी उनका रुख भी कांग्रेस के खिलाफ चला गया। इंदिरा गांधी के खिलाफ फैसले की एक पृष्ठभूमि यह भी है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के उनके खिलाफ फैसला देने वाले जज जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा बिहार के जमींदार घराने के कायस्थ थे। कोई आदमी जज बनने से अपनी वर्ग चेतना से अलग हो जाता है यह घोषित करना नितांत लफ्फाजी होगी। इंदिरा गांधी ने भी जवाहर लाल नेहरू के सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए गरीब जनता में अपनी पैठ बढ़ाने की रणनीति आजमाई और इसमें वे भी समानांतर सत्ताओं से टकराने से नहीं हिचकी। राजाओं के प्रिवीपर्स खत्म करने का मामला हो या बैंकों के राष्ट्रीयकरण का वे प्रतीक बन गई थी। आजादी और लोकतंत्र की वजह से उभरी जनआकांक्षाओं को मूर्त रूप देने वाली सत्ता उपकरण की और दूसरी तरफ उनके कदमों से आहत यथास्थितिवादी शक्तियां थी। देश की नवजात आजादी और लोकतंत्र के बीच भारतीय सत्ता दुर्ग को अस्थिर कर देने वाला इलाहाबाद हाईकोर्ट का इंदिरा गांधी के विरोध में जब फैसला आया तो गरीब जनता इसी कारण बुरी तरह विचलित थी। माहौल यह था कि अगर सत्ता शिखर पर बदलाव हो जाता तो आने वाला नेतृत्व यथास्थितिवादी ताकतों की ठकुर सुहाती के लिए अपने को विवश पाता क्योंकि जाने अनजाने में हाईकोर्ट के फैसले का अर्थ यह निकल रहा था कि आखिर इंदिरा गांधी को राजा महाराजाओं और सरमाएदारों से टकराने का नतीजा भुगतना ही पड़ा। यह ख्याल गलत हो या सही लेकिन इसी तरह के मूल्यांकन की वजह से आम जनता उस समय चाहती थी कि कैसे भी इंदिरा गांधी सत्ता में टिकी रहें और इसी ने उनको इमरजेंसी लगाने का साहस दिया। नेताओं पर इमरजेंसी के कारण जो भी बीती हो पर आम आदमी को तो पहली बार आजादी का एहसास इमरजेंसी की वजह से ही हुआ। ट्रेनें समय पर चलने लगीं। दफ्तरों में बिना रिश्वत के काम होने लगे। निरीह जनता पर अत्याचार करने वाले गुंडे मवाली भाग खड़े हुए। विनोबा भावे ने आजादी इमरजेंसी को अनुशासन पर्व की संज्ञा दी तो इसमें कुछ गलत नहीं था। अनुशासन सबसे ज्यादा फायदेमंद गरीब और वंचित जनता के लिए होता है और किसी देश में अनुशासन तब आता है जब गरीब जनता के प्रति हमदर्दी रखने वाली सरकार सर्वोपरि हो। उसके सामने कोई समानांतर सत्ता का दर्जा न रखता हो। हालांकि इमरजेंसी के शुरूआती दौर के बाद इंदिरा गांधी अपने छोटे बेटे संजय गांधी और उनके लफंगे साथियों की वजह से अच्छा दौर कायम नहीं रख पाई। उनकी टोली की वजह से जो कारनामे बाद में हुए उन्हीं के कारण 1977 में सिर्फ उत्तर भारत में कांग्रेस को करारी पराजय का सामना करना पड़ा। अगर आडवाणी जैसे लोग इमरजेंसी को लोकतांत्रिक समाज के लिए इतना बड़ा खलनायक मानते थे तो उन्हें चाहिए था कि वे आगे चलकर ऐसे राजनीतिक सुधार लागू कराते जिनमें समानांतर सत्ताएं पनपने की कोई गुंजायश नहीं रहती पर आलम यह हुआ कि स्थानीय स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक स्थापित हुई समानांतर सत्ताओं ने वैध सत्ता को पंगु कर दिया। इमरजेंसी में जितना लोकतंत्र बचा था उतना भी लोकतंत्र आज नहीं रह गया है। लोकतंत्र पीडि़त जनता के फटे पैरों की बिबाई है। यह इस नाम पर बुद्धि विलास करने वाले उन नेताओं के सर्टिफिकेट से नहीं समझा जा सकता जिनके पैर इतने सुकुमार हैं कि उन्होंने तो कोई बिबाई कभी देखी ही नहीं है।

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