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अमर सिंह से ऐसी क्या गरज है...........

Posted On: 24 Jul, 2015 Others में

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मुलायम सिंह से मनमुटाव के बाद अमर सिंह ने पूरे परिवार समेत उनके लिए क्या कुछ नहीं कहा फिर भी सपा सुप्रीमों पार्टी में उनकी वापसी कराने के लिए परिवार से लेकर सहयोगी नेताओं तक में जमीन आसमान के कुलाबे जोड़ने में लगे हुए हैं। उनकी इस मशक्कत पर आम लोग ही नहीं राजनैतिक मामलों का विश्लेषण करने वाले धुरंधर पंडित तक हैरत में हैं।
अमर सिंह ने एक बार धमकी दी थी कि अगर उन्होंने मुलायम सिंह की करतूतों पर अपनी जुबान खोल दी तो गजब हो जायेगा लेकिन सब जानते हैं कि नेताजी के बारे में जुबान खोलना इतना आसान नहीं है इसलिए अमर सिंह भी खूब नाराज बने रहे लेकिन ऐसा साहस नहीं कर सके। जाहिर है कि मुलायम सिंह को अमर सिंह की गरज किसी डर की वजह से महसूस नहीं हो रही लेकिन फिर उनमें ऐसे क्या लाल लटके हैं जो मुलायम सिंह उन पर घोर अनबन हो जाने के बावजूद लट्टू बने हैं। निश्चित रूप से यह एक पहेली है।
एचडी देवगौड़ा जब प्रधानमंत्री थे उस समय शुरूआत में अमर सिंह मुलायम सिंह के निजी मित्र से ज्यादा कुछ नहीं थे। सत्ता के गलियारों में उनकी बेरोकटोक आमदरफ्त को लेकर एक दिन अंग्रेजी के एक अखबार में प्रश्न चिन्ह लगाते हुए खबर छप गई जिसके बाद देवेगौड़ा को मुलायम सिंह से कहना पड़ा कि वे अमर सिंह को अपनी पार्टी में कोई पद दे दे वरना सरकार की बड़ी फजीहत हो रही है। इसी के बाद अमर सिंह समाजवादी पार्टी में राष्ट्रीय महासचिव के ओहदे से नवाजे गये।
पहले यह एक संयोग था लेकिन बाद में अमर सिंह फंड मैनेजमेंट में निपुणता के चलते मुलायम सिंह की राजनैतिक जरूरत भी बन गए। होते-होते अमर सिंह नेताजी पर इस कदर हावी हो गये कि वे उनकी कोई भी बात काटने में हिचकने लगे। इस रुतबे के अहसास ने अमर सिंह में इतना गुरूर भर दिया कि पार्टी के और लोगों के साथ-साथ उन्होंने मुलायम सिंह के घर के लोगों को भी कुछ समझना बंद कर दिया। इसी में उनका झगड़ा प्रोफेसर रामगोपाल यादव और आजम खां से हो गया। उन दिनों अमर सिंह मुलायम सिंह को इतना ज्यादा सम्मोहित कर चुके थे कि उन्होंने इन अपनों की कोई परवाह नहीं की लेकिन वक्त बदला तो अमर सिंह के सितारे भी गर्दिश में आ गये।
फिर भी मुलायम सिंह का मोह अमर के प्रति खत्म नही हो पाया था इसलिए उन्होंने अमर सिंह का निष्कासन टालने के लिए यह सवाल रखा कि अमर सिंह न रहे तो पार्टी चलाने के लिए पैसा कहां से आयेगा। तब प्रोफेसर रामगोपाल यादव ने कहा कि इसकी व्यवस्था वे करेंगे आप इसकी चिंता न करे। संयोग से अमर सिंह के अलग होने के बाद 2012 के विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की जनता ने मुलायम सिंह को राज्य की सत्ता का तोहफा दे डाला जिससे फंड मैनेजमेंट की समस्या से परेशान होने की जरूरत पार्टी को नहीं रह गई।
लेकिन साढ़े तीन वर्ष की सरकार के तजुर्बे में एक बात सामने आई है कि जनता से सीधे जुड़े विभागों तक में और वह भी निचले स्तर तक पैसे लेकर ट्रांसफर, पोस्टिंग के जरिए फंड जुटाने का तरीका राज्य सरकार और पार्टी की छवि पर बहुत भारी पड़ रहा है। इसके चलते पूरा सरकारी तंत्र भ्रष्ट मशीनरी में तबदील हो चुका है और रोजमर्रा के काम तक बिना घूस दिए कराना संभव नहीं रह गया। इस स्थिति ने प्रदेश भर में हाहाकार मचा कर रख दिया है और मीडिया मैनेजमेंट के बावजूद वास्तविकता पर पर्दा नही पड़ रहा। इन हालातों में मुलायम सिंह को अमर की कुशलता खूब याद आ रही है जो उद्योगपतियों से फंड कलेक्शन करते थे जिससे जनहित को नुकसान तो बड़ा हो सकता था लेकिन उसका प्रभाव इतना अप्रत्यक्ष था कि भ्रष्टाचार की वजह से सरकार की बहुत बदनामी हो रही थी।
मुलायम सिंह इस समय यह बात भांप चुके है कि अगर विधानसभा चुनाव के पहले तक राज्य में प्रशासन की कार्यप्रणाली को स्वच्छ न बनाया गया तो इन्तहा हो जाने की वजह से जनता उनकी पार्टी को कड़ा सबक सिखा सकती है इस अंदेशे ने उन्हें बहुत बेचैन कर रखा है। परिवार के कोर ग्रुप की बैठक में मुलायम सिंह ने इस बात को सामने रखा था और अमर सिंह की पार्टी में वापसी के लिए सहमति बनाने की कोशिश की थी। इसी का नतीजा है कि हर कीमत पर अमर सिंह के पार्टी में आने का विरोध करने पर आमादा प्रो. रामगोपाल यादव का रुख अब लचीला हो गया है। अखिलेश द्वारा अपने आवास पर आयोजित रोजा अफ्तार में यह जानते हुए भी कि अमर सिंह को दावतनामा गया है और वे आएगें भी प्रो. रामगोपाल यादव ने मौजूद रहने में कोताही नहीं की जबकि शिवपाल सिंह यादव और आजम खां अखिलेश के रोजाअफ्तार से कन्नी काट गये जिसे लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। वैसे शिवपाल को तो अमर सिंह पहले ही पटा चुके हैं लेकिन शिवपाल अखिलेश से खुश नहीं हैं इसलिए माना जा रहा है कि उनके रोजाअफ्तार में न जाने का फैसला उन्होंने अखिलेश को अपनी अप्रसन्नता का एहसास कराने के लिए किया होगा जबकि खां साहब अभी भी अमर सिंह के मामले में किसी भी तरह के समझौते के मूड में नहीं हैं। उनकी पत्नी को राज्यसभा में भेजने का एहसान मुलायम सिंह ने इसीलिए किया था कि वे अमर सिंह के मामले में ठंडे हो जाए लेकिन लगता है कि उनको इसमें शायद ही कामयाबी मिल पाये। इसके बावजूद आसार यह है कि मुलायम सिंह अमर को वापस लाकर रहेंगे भले ही आजम खां की नाराजगी उन्हें झेलना पड़े।



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