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टोलरेंस की पावर से सदियों से अखंड बना है यह भारत

Posted On: 31 Jul, 2015 Others में

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छोटा शकील ने याकूब मेमन को दी गई फांसी की प्रतिक्रिया में भारत को धमकी दी है कि वह अब इसका नतीजा भुगतने के लिए तैयार रहे। छोटा शकील के कहने के पहले ही भारत की खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों व सरकार के कर्णधारों ने यह अनुमान कर लिया होगा कि इस मामले में आतंकवादी संगठन बदले की कार्रवाई का प्रयास कर सकते हैं लेकिन इस डर से भारतीय राष्ट्र राज्य सहमा रहे और आतंकवाद को झेलता रहे यह कोई तुक नहीं है। आतंकवाद के मामले में भारत में स्थितियां ऐसी हद पर पहुंच गई हैं जहां सख्त राज्य के रूप में विध्वंसकारी ताकतों को अपने तेवर दिखाना उसके लिए जरूरी हो गया है। भले ही कुछ समय के लिए यहां की सरकार प्रशासन और लोगों को इसकी कोई भी कीमत न चुकानी पड़े।
दूसरी ओर इस बात पर भी गौर किया जाना चाहिए कि याकूब मेमन के परिवार ने इस पूरे घटनाक्रम में जिस संयम का परिचय दिया वह अभिभूत करने वाला है। याकूब मेमन को सुपुर्द-ए-खाक करते समय हजारों गमगीन लोगों की भीड़ मौजूद थी लेकिन पुलिस से ज्यादा मेमन परिवार इस बात के लिए सतर्क था कि कहीं कोई ऐसी प्रतिक्रिया न कर दे जिससे वे एक बार फिर देश के सामने शर्मसार होने को मजबूर हों। अगर मेमन परिवार में इस देश के प्रति लगाव न होता तो वह इस परिस्थिति को कैश कराने के लिए दूसरा रुख भी अपना सकता था। याकूब मेमन ने भी मरते मरते लोगों को उकसाने का एक बयान जेल के अंदर से जारी करने की कोशिश नहीं की। उसने सिर्फ इतना कहा कि वे उसे फांसी पर लटका कर मार डालने का इरादा बना चुके हैं इसलिए अब उसे रहम नहीं मिल सकता लेकिन वह जिस गुनाह के लिए फांसी पर लटकाया जा रहा है वह गुनाह उसने किया नहीं है।
आतंकवादी रास्ते पर चलने के बाद मुख्य धारा में लौटे कश्मीर के कांग्रेसी विधायक उस्मान मजीद ने इस मामले में एक गौरतलब बयान जारी किया है। उन्होंने एक बात तो यह कही कि टाइगर मेमन पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में मुंबई बम विस्फोट के बाद आता रहा और उसे इस दौरान राजकीय अतिथि जैसा दर्जा मिलता रहा। उन्होंने बताया कि 1993 से 1994 तक खुद उनकी मुलाकात पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में टाइगर मेमन के साथ तीन बार हुई। उन्होंने इशारे इशारे में पर्दाफाश किया कि मार्च 1993 में मुंबई में हुए सीरियल बम धमाकों में पाकिस्तान खुफिया एजेंसी आईएसआई की भूमिका थी और यह धमाके टाइगर मेमन ने ही कराए थे यह बात भी मेमन ने खुद उस्मान को बताई थी। उस्मान मजीद के इस बयान से यह जाहिर हो जाता है कि मेमन परिवार निश्चित रूप से मुंबई बम धमाकों की साजिश में शामिल था लेकिन इसके पीछे जज्बाती कारण रहे देशद्रोह की भावना नहीं। टाइगर मेमन ने उस्मान को यह भी बताया था कि मुंबई दंगों के बाद उसके पास मुस्लिम औरतें चूडिय़ां लेकर आई थी जिसकी वजह से वह रौ में बह गया। पूरा मेमन परिवार तात्कालिक भावनात्मक ज्वार में ऐसा कर बैठा जो उसे नहीं करना चाहिए था लेकिन यह सिर्फ मुसलमान होने के नाते उस परिवार की कमजोरी नहीं थी। इस देश की कुछ मौलिक विशेषताओं में यह भी है कि यहां लोग जातिगत, सांप्रदायिक, क्षेत्रीय, भाषाई अस्मिता को राष्ट्र के ऊपर महत्व देते हैं इसलिए यहां की व्यवस्था भी निरपेक्ष न्याय न करके भावनात्मक कारणों को अपने जहन में रखती है। मुसलमानों के स्वयंभू मसीहा और अपने मुंह से अपने को मौलाना कहने वाले मुलायम सिंह नरेंद्र मोदी से नजदीकी होने के बाद काफी कुछ तरल हो गए हैं इसलिए इस बार राष्ट्रभक्ति को ध्यान में रखकर मुसलमानों के जज्बात का मामला होते हुए भी उनके मुंह से याकूब मेमन को फांसी देने के विरोध में एक शब्द नहीं निकला। यह दूसरी बात है कि मुलायम सिंह ने भी बाइस लोगों की सामूहिक हत्या में आरोपित होने के बावजूद फूलन देवी को रिहाई दिलाई थी। उसके पीछे भारतीय समाज की विशिष्ट व्यवस्थाओं का तर्क था जिसे वे सीधे और सपाट न्याय के तकाजे से ऊपर समझते थे। आज सवाल यह उठ रहा है कि अगर बेअंत सिंह के हत्यारे बलवंत सिंह के पक्ष में पंजाब विधान सभा प्रस्ताव पारित कर सकती है और राजीव गांधी के हत्यारों को रिहा करने का फैसला तमिलनाडु की सरकार ले सकती है इसके बावजूद उनकी देशभक्ति पर उंगली नहीं उठाई गई तो याकूब मेमन से हमदर्दी की गुजारिश करने वालों को देशद्रोही क्यों घोषित किया जा रहा है।
भारत एक आप्राकृतिक देश है। चक्रवर्ती सम्राट बनने की महत्वाकांक्षा को महिमा मंडित किए जाने से दुनिया में साम्राज्यवाद का पहला सूत्रपात भारत में हुआ और इसमें विशाल साम्राज्य के लिए एक दूसरे से रंग, भाषा, जलवायु और भूगोल इत्यादि सभी मामलों में जमीन आसमान का अंतर रखने वाले हिस्से जबरन आपस में नत्थी कर लिए गए। बेहतर और न्यायपूर्ण शासन के लिए राज्य का एक सीमा से अधिक विस्तार अनुपयुक्त होता है। भारत के मामले में भी यह बात साबित है लेकिन दुनिया का कोई देश इतनी विशालता में उस ढंग की अखंडता को चिरंतन नहीं बना सका जो भारत में कायम है। यह एक चमत्कार से कम नहीं है लेकिन यह नहीं भूला जाना चाहिए कि इसके पीछे भारत में व्यवस्था से लेकर लोगों तक में टोलरेंस पावर का होना है जिसमें अतिवादी प्रतिक्रिया पर भी कोई गंभीर नहीं होता और वह प्रतिक्रिया बाद में अपनी मौत मर जाती है। अगर किसी अतिवादी प्रतिक्रिया को लेकर निर्णायक रुख बनाने की पद्धति को भारत ने अपनाया होता तो यह कई मुद्दों पर कई कई बार टूट चुका होता लेकिन मोदी सरकार पदारूढ़ होने के बाद इस मामले में स्थितियां जिस तरह से बदल रही हैं वह देश के लिए शुभ शकुन नहीं है।
पश्चिम के प्रभाव में देश की न्याय पालिका मृत्युदंड को समाप्त करने की मानसिकता कुछ वर्षों से बनाती नजर आ रही है। चाहे निठारी कांड के अभियुक्त को तकनीकी आधार पर मृत्युदंड से बचाना हो अथवा राजीव गांधी के हत्यारों को न्याय पालिका इस दिशा में अग्रसर नजर आई जबकि पिछले कुछ वर्षों से लगातार यह चर्चा चल रही है कि भारत में लोकतंत्र कुछ ज्यादा ही हो गया है जिससे यहां अराजक स्थितियां बन रही हैं। इसके बावजूद न्याय पालिका विचलित नहीं हुई। उसने इस बात पर गौर नहीं किया कि मृत्युदंड समाप्त करने जैसी उन्नत व्यवस्था तब अपनाई जाती है जब उस देश में कानून के शासन ने मजबूती से पैर जमा लिए हों। अभी तो यह देश कबीलाई शासन के तहत चल रहा है जिसमें कानून के शासन की बजाय मुंह देखे आधार पर अधिकार और सुविधाएं मिलती हैं। इस कारण यहां तो मृत्युदंड का विधान समाप्त करना व्यवस्था की चूलें हिला देने का कारण बनेगा। फिर भी पश्चिमी प्रभाव से जनित पूर्वाग्रहों के कारण न्याय पालिका यह समझने को तैयार नहीं थी लेकिन टाइगर मेमन के मामले में उसने असाधारण तौर पर दो टूक रवैया अपनाया। उसकी हर मर्सीपिटीशन को एक झटके में सारी दलीलें अस्वीकार करते हुए नकार दिया। जाहिर है कि जिस देश में जाति, क्षेत्र और धर्म पर आधारित अस्मिताएं बहुत महत्वपूर्ण हों वहां न्याय पालिका के इस रुख से एक समुदाय में उसके प्रति अविश्वास पैदा होगा ही लेकिन याकूब मेमन की खुली पक्षधरता करने वालों में मुसलमान न्यून थे दूसरे लोग ज्यादा। फांसी के बाद भी दो पूर्व जज फैसले को गलत ठहरा रहे हैं और दोनों ही मुसलमान नहीं हैं। रा के शीर्ष अधिकारी ने भी याकूब को फांसी देने को बहुत बेजा बात बताया था। आधी रात के बाद जिन लोगों ने याकूब को उच्चतम न्यायालय में बचाने की अंंतिम कोशिश की उन वकीलों में भी कोई मुसलमान नहीं था। साफ है कि याकूब के मामले में बहुत कुछ ऐसा था जिससे एक बड़ा वर्ग उसे फांसी देने के फैसले को अपने गले से नहीं उतार पाया है। अब फांसी हो चुकी है जो बदल नहीं सकती। फिर उसकी फांसी पर आपत्ति करने वालों के प्रति बहुत उत्तेजित होने की जरूरत क्या है। याकूब मेमन और उसका परिवार कुल मिलाकर देशद्रोही मानसिकता बना चुका था। यह बात तो बिल्कुल भी साबित नहीं हो रही लेकिन वे नादान लोग जरूर जाने अनजाने में राष्ट्रीय हितों के साथ एक बड़ा द्रोह कर रहे हैं जो प्रशांत भूषण को फटे जूते से मारने की बात करते हैं जो इसे मुसलमानों को अपमानित करने के एक अच्छे बहाने के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। इनका प्रतिरोध अवश्य ही होना चाहिए।

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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jitendra Mathur के द्वारा
July 14, 2016

आपके विचार तर्कपूर्ण हैं । याकूब मेमन एक सुशिक्षित व्यक्ति था और विस्फोटों के हादसे में लपेटे जाने से पूर्व वह मुंबई के सर्वाधिक प्रतिभाशाली युवा चार्टर्ड एकाउंटेंटों में गिना जाता था । उसने विस्फोटों में कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं निभाई बल्कि वादामाफ़ गवाह बनकर जाँच एजेंसियों को पूरा सहयोग दिया तथा अन्य कई अपराधियों के पकड़े जाने में सीबीआई की सहायता की । उसे भारतीय अधिकारियों ने अपने प्रयासों से गिरफ़्तार नहीं किया था बल्कि उसने स्वेच्छा से आत्मसमर्पण किया था जिसके उपरांत उसने इक्कीस वर्ष जेल में भी बिताए । भारतीय दंड विधान वादामाफ़ गवाह के साथ रियायत करता है जो कि जनभावनाओं के ज्वार में बहकर हमारी न्यायपालिका ने याक़ूब मेमन को नहीं दी । उसने न तो कभी कोई देशविरोधी बात कही और न ही कभी मुस्लिम समाज को भड़काने का कोई प्रयास किया । हमारी व्यवस्था ने उसके साथ निश्चय ही अन्याय किया है क्योंकि वह काबू में आ गया बलि का बकरा था जिसकी बलि चढ़ाकर तथाकथित राष्ट्रवाद को संतुष्ट किया गया तथा राष्ट्रवाद की राजनीति करने वालों ने अपने लिए अतिरिक्त वोट पक्के किए । न्यायपालिका का भी इस संदर्भ में पक्षपाती हो जाना दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जाएगा । ऐसा वातावरण बना दिया गया है कि याक़ूब मेमन की फाँसी के विरोध में कोई भी तर्क देने वाला अनावश्यक रूप से देशविरोधी होने का बिल्ला अपने पर लगा बैठता है । अब हमारी नालायक पुलिस और सीबीआई टाइगर मेमन को पकड़ने के लिए कोई कदम नहीं उठा रही है क्योंकि याक़ूब मेमन को फाँसी देने से बलपूर्वक भड़काई गई जनभावनाएं ठंडी पड़ गई हैं तथा उनके राजनीतिक आकाओं को अपना राजनीतिक लाभ मिल गया है ।


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