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राजशेखर और आशुतोष पांडेय का सुशासन

Posted On: 1 Aug, 2015 Others में

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हर पार्टी इन दिनों सुशासन देने का वायदा करके सत्ता में आती है लेकिन सुशासन का पैमाना क्या है यह सवाल अबूझ है। शायद जनसामान्य की समस्या का त्वरित और प्रभावी निदान ही सुशासन की सर्वोपरि विशेषता है। इस कसौटी पर परखें तो देश के हालात बहुत अच्छे नजर नहीं आते। पिछले कुछ वर्षों से स्थिति यह बनती जा रही है कि किसी पीडि़त की सुनवाई तब तक नहीं होती जब तक कि वह नेता, अधिकारी, वकील या पत्रकार से न जुड़ा हो। जनहित गारंटी अधिनियम लागू हो जाने के बावजूद जनसामान्य का बिल्कुल जायज और साधारण काम तक होना बिना सुविधा शुल्क दिए मुश्किल है। कानून का शासन तो जैसे कहीं तेल बेचने चला गया है। हकीकत तो यह है कि प्रशासन में जो अराजकता की स्थिति पनप चुकी है वह जंगलराज को भी मात करने वाली है। कानून व्यवस्था से लोगों का उठता विश्वास आने वाले गंभीर खतरे का लक्षण है। निरीह नजर आने वाला आवाम अगर गिरता मरता कभी अपने भी अस्तित्व को दिखाने की सोच बैठा तो व्यवस्था के निरंकुश कर्ताधर्ताओं की क्या गत बनेगी इसका आभास भारत जैसे शक्तिशाली राष्ट्र राज्य के दमन तंत्र का नक्सल प्रभावित इलाकों में निरुपाय स्थिति में पहुंच जाने से किया जा सकता है।
राजनीतिक दलों में सुशासन कायम करने की इच्छाशक्ति नहीं बची है क्योंकि उन्होंने लोकतंत्र को देखते ही देखते गिरोह तंत्र में बदल कर रख दिया है। उनके गिरोह में जो शामिल हैं वे किसी की जमीन पर कब्जा कर लें, किसी की बहू बेटी पर बुरी निगाह डालें यहां तक कि किसी की हत्या भी कर डालें फिर भी पुलिस रिपोर्ट लिखने की बजाय मुकदर्शक बनी रहे इसी में वे अपनी सरकार की सार्थकता समझते हैं। चुनाव लडऩे के लिए फंड की व्यवस्था वे अधिकारियों और कर्मचारियों से लूट कराकर करना चाहते हैं। विकाास जरूरत के मानकों की बजाय गिरोह के लोगों की सुविधा के मुताबिक कराना उनका सिद्धांत है। ऐसे में किसी सिस्टम का बना रह पाना संभव ही नहीं है।
उधर उच्च प्रशासनिक सेवा में विलक्षण प्रतिभा के नौकरशाह शामिल होते हैं। उनकी ऊर्जा पर संदेह नहीं किया जा सकता। ऐसे लोगों में कुछ कर गुजरने की भावना भी नैसर्गिक रूप से होती है। उफनती जलधारा के वेग को बड़े बड़े बांध रोक कर नहीं रख पाते। अगर नौकरशाह जाग्रत रहें तो राजनीतिक परिस्थितियों की बंदिशें कुछ कर दिखाने के मामले में कहां तक रोक सकती हैं। विडंबना यह है कि अधिकांश नौकरशाहों ने आत्मबोध खो दिया है। उन्हें उबारने के लिए किसी अस्तित्ववादी आंदोलन की जरूरत है। दूसरी ओर कुछ नौकरशाह व्यक्ति वीरता के शिकार हैं। यह दुनिया एक विशाल यंत्र है जिसमें हर पुर्जे यानी आदमी की सीमित भूमिका है। अगर वह अपनी भूमिका दुरुस्त ढंग से निभाता है तो व्यवस्था सुधारने में बहुत खामोशी के साथ वह बड़ा कारगर हस्तक्षेप करके दिखा सकता है। स्थिति तब उसके लिए बेढब हो जाती है जब वह सोचता है कि उसके पास पूरे तंत्र को एकदम ठीक कर देने का ठेका होना चाहिए। हरियाणा कैडर के आईएएस अधिकारी अशोक खेमका इसके उदाहरण हैं जो यूपीए सरकार में अपने इसी स्वभाव की वजह से पीडि़त रहे लेकिन निजाम बदलने के बाद ही उनकी मुश्किलें खत्म नहीं हुई। राज्य की नई हुकूमत ने शुरूआत में उनके मामले में बवाल से बचो की नीति अपनाते हुए उन्हें पुरातत्व विभाग में दफन रखने का इंतजाम कर लिया था लेकिन यह दूसरी बात है कि मीडिया में यह मामला तूल पकड़ जाने से बाद में उन्हें मोक्ष मिल गया। उत्तर प्रदेश में मुख्तार अंसारी के मामले में सरफरोशी की तमन्ना दिखाकर पूर्व डिप्टी एसपी शैलेंद्र सिंह सिस्टम से अलग हो गए और किसी मतलब के नहीं बचे। अंदेशा यह है कि प्रदेश के दूसरे क्रांतिकारी अधिकारियों की नियति भी इसी तरह की साबित न हो जाए।
उधर ऐसे भी अधिकारी हैं जो इसी सिस्टम में रहते हुए सुशासन का गुर दिखाकर व्यवस्था के प्रति लोगों में आस्था बहाल करने में सफल हो रहे हैं। कई वर्ष पहले केरल के कैडर आईएएस अधिकारी जेके अल्फांसो की किताब मैंने पढ़ी थी जो दिल्ली नगर महापालिका में तैनाती के बाद अपने धांसू अंदाज की वजह से काफी चर्चित रहे थे। उन्होंने अपनी किताब में केरल में कलेक्टर रहने के दौरान के तजुर्बे शेयर किए। किताब का सार यह है कि एक नौकरशाह किस तरह लोगों की समस्याओं का वास्तविक रूप से समाधान करके अपने को साार्थक साबित कर सकता है। उनके गुरु मंत्र काफी महत्वपूर्ण और प्रयोजनीय हैं। लखनऊ के वर्तमान जिलाधिकारी राजशेखर की कार्यप्रणाली में मैंने प्रत्यक्ष रूप से इस बात को देखा तो मुझे अल्फांसो की किताब की याद आ गई। राजशेखर ने झांसी और जालौन के जिलाधिकारी रहते हुए जनसुविधा केेंद्र की व्यवस्था संचालित की। इस केेंद्र के नंबर पर जो शिकायत नोट हो गई प्राथमिकता के हिसाब से उसका निस्तारण समय सीमा के अंदर किया जाना आवश्यक बना दिया गया था। मैंने साफ देखा कि लाल फीताशाही की रोक की प्रवृत्ति उक्त जिलों में उनके कार्यकाल में जड़ से समाप्त हो गई थी क्योंकि अधिकारियों को मालूम था कि अगर उन्होंने शिकायती आवेदनों को विलंबित करने की कोशिश की तो उन पर दंडात्मक कार्रवाई तय है। अधिकारियों, कर्मचारियों की मनमानी इस व्यवस्था की पूर्ण पारदर्शिता की वजह से बंद हो गई थी। विधि व्यवस्था को केवल एक अधिकारी कैसे पटरी पर ला सकता है राजशेखर ने इसे चरितार्थ दिखा दिया। आश्चर्य की बात यह है कि उनके कार्यकाल में प्रशासन में मुंह देखे व्यवहार की गुंजायश न रहते हुए भी उनके लिए नेताओं का कोपभाजन बनने की नौबत बिल्कुल नहीं आई। उन्हें मायावती सरकार में लगातार कलेक्टर के चार्ज मिले जिससे कहा जाने लगा था कि वे बसपा के आदमी हैं लेकिन काबिल अधिकारियों पर कोई ठप्पा नहीं लगता इसीलिए अखिलेश सरकार ने भी बिना किसी पूर्वाग्रह के उनकी क्षमताओं पर भरोसा किया और प्रदेश की राजधानी में उनकी लंबी पारी इसका उदाहरण है।
सुशासन की पहल पुलिस विभाग में कानपुर के आईजी जोन आशुतोष पांडेय ने की है जिसके शानदार नतीजे सामने आए हैं। उन्होंने हाईटेक तकनीक के प्रयोग से उस पुलिस में नए प्राण फूंक दिए हैं जिसके बारे में कहा जाता था कि उत्तर प्रदेश में खाकी का तो जमीर पूरी तरह मर चुका है। प्रोजेक्ट आईना से उन्होंने पूरे पुलिस तंत्र को जवाबदेही के शिकंजे में कसने का सफल प्रयोग किया था लेकिन भरोसे के नंबर का उनका प्रयोग तो अद्भुत साबित हुआ है। अब पीडि़तों की रिपोर्ट थानों को लिखनी पड़ रही है। एफआईआर लिखकर मामले को ठंडे बस्ते में डालने की पुलिसिया हरकत पर काफी हद तक विराम लगा है। क्या आशुतोष पांंडेय के इस प्रयास से सत्ता के लोग उनसे नाराज हैं? कदापि नहीं बल्कि अच्छे नतीजे सामने आने से उन्हें सत्ता का पूरा वरदहस्त मिल रहा है। राजशेखर और आशुतोष पांडेय की तरह व्यवस्था में सुशासन के तत्व के लिए अन्य आईएएस और आईपीएस अधिकारी क्या पहल नहीं कर सकते। जरूर कर सकते हैं और करनी चाहिए। यह गलत धारणा है कि नौकरशाही जनता के लिए हमेशा विलेन होती है। नौकरशाही में लोगों के हीरो बनने की गुंजायश अन्य क्षेत्रों से कहीं ज्यादा है।
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