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यह जो भारत है इसका राष्ट्र रहस्य

Posted On: 14 Oct, 2015 Others में

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महाराष्ट्र में देवेन्द्र फडनवीस के नेतृत्व वाली गठबंधन वाली सरकार की हालत नाजुक होती जा रही है | पहले दिन से ही यह गठबंधन बेमन का जाहिर हो रहा था और इस बीच कई अवसरों पर शिव सेना ने भा. ज.पा. को नीचा दिखाने का मौका नहीं गवाया लेकिन मुंबई नगर महापालिका के चुनाव के पहले गठबंधन की लादी से निजात पाने के लिए शिव सेना कुछ ज्यादा ही बेसब्र हो उठी है | मुंबई नगर महापालिका के बारे में बताया जाता है कि उसका बजट पूर्वोत्तर के सातों राज्यों के कुल बजट से भी ज्यादा होता है इसलिए शिव सेना चाहती है कि वह बिना भा. ज.पा. की पार्टनरशिप के इस पर कब्ज़ा जमाये | वैसे भी सरकार बनाने के बाद से राज्य में भा. ज. पा के बुरे दिनों की शुरुआत हो गयी है तब से राज्य में जितने भी स्थानीय और पंचायत चुनाव हुए सभी में भा. ज.पा को हार का सामना करना पडा है लेकिन सोचने वाली बात यह है कि रास्ट्रवाद की ठेकेदार एक पार्टी अपने ही मिजाज और मंसूबे की दूसरी पार्टी से निभा क्यों नहीं पा रही |
उत्तर भारतीयों के खिलाफ जिस तरह का हिंसक रवैया शिव सेना अपनाती है उसके बाद भी भा.ज.पा. का ही दम है जो उसे रास्ट्रवादी होने का प्रमाण पत्र देती रही | देश की अखंडता को चोट पहुचाने वाली हरकतें तभी राष्ट्रद्रोह की परिभाषा में नहीं आती जब उन्हें करने वाले दूसरे मजहब से सम्बंधित हो शिव सेना जैसे पार्टी जो धर्म में हिन्दू है उसकी हरकतें राष्ट्रद्रोही ही कही जाएँगी लेकिन शिव सेना के बारे में भी ऐसी धारणा बनाना शायद उचित न हो इस देश में तमाम परिभाषाओं को दूसरे ढंग से लागू करने की जरूरत है क्योकि यह की संरचना का इतिहास सबसे अलग और अनूठा है |
चन्द्र गुप्त मौर्या के पहले देश में गणतांत्रिक शासन था जिसका मतलब है हर इलाके में वही के लोगो का स्वशासन | चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपने गुरू कौटिल्य के मार्ग दर्शन के कारण इस व्यवस्था को तोड़ डाला और साम्राज्य स्थापित किया जिसमे देश की राजधानी पाटिल पुत्र के चश्मे से कांधार और मदुरे की व्यवस्था का संचालन होता था अगर भगवान् राम एक मिथक नहीं इतिहास पुरुष माने जाए तो ईसा से ९ हजार साल पहले उन्होंने दुनिया में साम्राज्यवादी शासन का सूत्रपात किया जिसमे अयोध्या की मंत्री परिषद सुदूर दक्षिण के लोगों का भाग्य निर्धारण करती थी | कहने को तो यह कहा जाता है कि प्रतापी राजाओं ने अपनी सीमा के बाहर और दूर तक के राज्यों की परवाह की जहा की प्रजा अपने निरंकुश राजा के दमन का शिकार हो रही थी जिसके कारण वहा के राजा को जीतकर सुशासन कायम करने के लिए उन्होंने हमले किये और इसी को व्यापकता प्रदान करते हुए अश्वमेध यग्य की परम्परा शुरू हुई लेकिन सत्य यह है कि एक विशाल साम्राज्य के शासन को प्राकृतिक नहीं कहा जा सकता | तमिलनाडु के लोग जिनकी भाषा, नस्ल, बोली सब कुछ जमीन और आसमान जितने अलग अलग है उन्हें अयोध्या के लोग अपने आधिपत्य में रखे तो उनके साथ न्याय कैसे हो सकता है भले ही सदियाँ बीत जाने के कारण वे इसे अपनी स्वतंत्रता का मुद्दा न बनाए लेकिन उनमे अलगाव तो रहेगा ही भारत वर्ष नाम का यह जो देश है अनेक राष्ट्रीयताओ का घालमेल है जिसके कारण कभी भाषा के आधार पर तो कभी किसी अन्य आधार पर यहाँ अलगाव की अभिव्यक्तियाँ मुखर होती ही रहती है अगर धर्म राष्ट्रीयता के लिए पर्याप्त आधार होता तो पूरा अरब एक देश होना चाहिए था |
राजीव गाँधी की हत्या पूरे देश के लिए एक ऐसा क्रत्य है जिसके जरिये राष्ट्रीय नेता की हत्या कर भारत राष्ट्र राज्य को चुनौती देने की जुर्रत की गयी है जिसके एहसास के कारण देश का हर कोना इसमें शामिल हत्यारों के लिए कड़ी से कड़ी सजा का तलब गार है लेकिन तमिलनाडु के लिए इस सन्दर्भ में राष्ट्रीय भावनाओं का कोई अर्थ नहीं है तभी तो जयललिता उनकी सम्मान पूर्वक रिहाई के लिए इतनी आतुर हो रही है यह गुत्थियां है जिन्हें भारतीय इतिहास के मर्म को समझने के बाद ही जाना जा सकता है लेकिन इसमें यह भी जुड़ा है कि स्वाभाविक रूप से एक देश न होते हुए भी अनेक राष्ट्रीयताओ का यह काकटेल सदियों से कायम चला आ रहा है और उसकी वजह है अलगाव की अभिव्यक्तियों के प्रति इसकी सहिष्णुता | अलगाव के आयामों को अब नया अवलम्ब मजहब का भी मिल गया है जिसकी वजह से जब यह अभिव्यक्तियाँ मजहब का चेहरा लेकर किसी ओवेशी का चेहरा लेकर सामने आती है तब भी यह राष्ट्र राज्य बहुत संवेदनशील नहीं होता और इसी सूत्र के सहारे उसका वजूद बदस्तूर बना हुआ है जिसमे कोई सेंध तात्कालिक तौर पर बड़ी उखाड़ पछाड़ होने के बाबजूद नहीं हो पाती भा. ज. पा. भारत के इसी राष्ट्र रहस्य को समझ नहीं पा रही बहरह इस समायोजन और संतुलन से एक राष्ट्र के संचालन के मॉडल की विस्तृत चर्चा तो अभी होती ही रहेगी लेकिन फिलहाल तो यह है कि अगर भा.ज पा. और शिव सेना गठबंधन टूटा तो क्या कुछ ही महीनो में महाराष्ट्र में विधान सभा के फिर चुनाव की नौबत आ जाएगी |

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