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मुलायम के निशाने पर एक बार फिर कांग्रेस

Posted On: 25 Nov, 2015 Others में

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सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने लखनऊ में जनेश्वर पार्क में अपने जन्म दिन समारोह की सभा को संबोधित करते हुए एक बार फिर नारायण दत्त तिवारी के बहाने कांग्रेस पर निशाना साधा है | आजकल वे कांग्रेस और भा ज पा दोनों से बराबर की दूरी रखने का राग फिर अलापने लगे है जबकि उन्हें जब जरूरत पड़ी तो वे कांग्रेस हाई कमान की चौखट पर बेआबरू होने के बाबजूद डट चुके है | मुलायम सिंह अपनी उम्र और लम्बी राजनीतिक पारी की वजह से भले ही राष्ट्रीय पटल पर वरिष्ठ नेता का संबोधन प्राप्त करने के अधिकारी बन चुके हो लेकिन तौर तरीके गाँवदारी की संकीर्ण राजनीति की झलक देते है जिसमे विराट सैध्दांतिक धरातल की जरूरत नहीं पड़ती लेकिन राष्ट्रीय राजनीति के लिए गाँव स्तर की पैतरेंबाजी बेहयाई का नमूना बन जाती है | मुलायम सिंह खुश किस्मत है कि इसके बाबजूद उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठा प्राप्त करने में कोई कठिनाई नहीं हुई लेकिन यह केवल अजूबों के इसी देश में सम्भव है वर्ना दुनिया के किसी और विशाल लोकतांत्रिक देश में उन्हें उचाई की एक पायदान चदना भी दूभर होता |
जहा तक नारायण दत्त तिवारी के प्रति उनकी श्रद्धा का प्रश्न है राजनीति के सारे पुराने जानकारों को मालूम है कि जब १९९१ में राजीव गांधी की कृपा से जनता दल के विभाजन के बाद जीवनदान के रूप में मिले उनकी सरकार को कांग्रेस के समर्थन की बापसी की मांग इटावा में शीला दीक्षित जैसी वरिष्ठ काग्रेसी नेता के सरकारी दमन के बाद नारायण दत्त तिवारी ने की थी तो कुपित होकर उन्होंने तिवारी के लिए क्या कहा था | मुलायम सिंह के बचन थे कि नारायण दत्त तिवारी सभलकर बोलना सीख ले वरना मुझे उनके बारे में बोलना पडा तो उनकी धोती की कांच तक खुल जायेगी | इसके बाद सपा बसपा गठबंधन के मुखिया रहते हुए नारायण दत्त तिवारी के दिल्ली से चलकर कोबरा पावर हाउस के गेस्ट हाउस में अज्ञात वास कर् जाने के रहस्यमय कारण को जग जाहिर करके उन्होंने नारायण दत्त तिवारी की कांच खोलकर ही दम ली थी | हालाकि एन डी भी कम परम नहीं है संजय गांधी की सार्वजनिक रूप से चप्पले उठाने से लेकर कर्नाटक के राज भवन में रंग रेलिया मनाते हुए उनका वीडियो टी वी चैनलों पर वायरल होने तक न जाने कितने काण्ड उनको लेकर उछले पर नारायण दत्त तिवारी का सिर कभी नीचे नहीं झुका | मुलायम सिंह ठीक ही कर रहे है जो उन्हें देश की वर्तमान और आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेरणा पुरुष के रूप में स्थापित करना चाहते है |
लेकिन मुद्दा निजी व्यक्तित्वों की मीमांसा का नहीं है , सवाल इस बात का है कि जब वे भाजपा और कांग्रेस दोनों से ही दूरी रखना चाहते है तो अकेले कांग्रेस पर इतने हमलावर क्यों है कि बेतुके प्रसंगों तक में उसकी आलोचना करने से वे नहीं रुक पा रहे | इसके पहले बिहार में अपने ही बनाए महागठबंधन से अलग होकर उन्होंने जो किया उसे लोगों ने भाजपा के हित साधन की कार गुजारी के रूप में देखा और इसमें कुछ अन्यथा बात भी नहीं थी भले ही वे सफाई कुछ भी दे और अब जगह जगह उस कांग्रेस के खिलाफ उनका विष वमन करना जो उत्तर प्रदेश में तीन में न तेरहा में , मृदंग बजाये डेरा में की दयनीय हालत में है यह जाहिर कर देता है कि वे किस कदर भाजपा के औजार के रूप में स्वयं को ढाल चुके है | वैसे उनके बारे में यह बात प्रचारित हो चुकी है कि वे अपने समर्थन को भरपूर कीमत में बेचने में माहिर है | राष्ट्रपति के चुनाव में वे कितने अपनों से किनारा करके कांग्रेस की गोद में जा बैठे थे, जिसे लेकर यही चर्चाये राजनीतिक फिजा में गूंजी थी कि उन्हें अच्छी खासी कीमत कांग्रेस से इस समर्थन के बदले मिली थी | इसके पहले नरसिंहा राव के समय भी उनकी जानी बूझी गफलत से बाबरी मस्जिद शहीद होने के बावजूद वामपंथियों आदि की परवाह न करके जब उनके विश्वास मत के समय वे उनकी सरकार बचाने के लिए लोकसभा से बर्हिगमन कर गये थे तब भी यह बात उठी थी की उनकी राव से डील हो गयी है | इसी कारण वामपंथियों से लेकर ममता बनर्जी तक सब उनसे ऐसी दूरी बनाने लगे है ताकि उन्हें दोबारा दगा खाने की नौबत न आये | उनके जन्म दिन में चर्चा थी कि लालू और नीतिश आयेंगे लेकिन दोनों ही मुह मोड़ गए | साफ़ है कि उनके समधी भी जान चुके है कि राजनीति में मुलायम सिंह पर भरोसा नहीं किया जा सकता और इसीलिए जनता दल परिवार को फिर एक करके राष्ट्रीय क्षितिज पर सबसे ताकत वर नेता के रूप में उभरने का उनका अरमान अब पूरी तरह मिटटी में मिल चुका है |
प्रदेश में पिछड़े वर्ग के बड़ी ताकत के रूप में उभरने के मद्दे नजर कांग्रेस पिपक्ष की काट के लिये वलराम सिंह यादव को उनकी जगह मुख्य मंत्री बनाने के विकल्प पर विचार करने लगी थी उस समय इटावा की राजनीति में उनसे चल रही जानी दुश्मनी की बजह से तिवारी ने मुलायम सिंह पर हाथ रखा और उनके कहने से ट्रांसफ़र व् अन्य मलाईदार काम किये और इसी से मुलायम सिंह को वह वित्तीय ताकत मिली कि वे प्रदेश की राजनीति में सबको पीछे छोडने में कामयाब रहे |

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