मुक्त विचार

Just another weblog

474 Posts

426 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 11660 postid : 1171212

दुनिया का प्रगतिवादी चरित्र और तात्विकता

Posted On 1 May, 2016 में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

दुनिया का प्रगतिवादी चरित्र जो कल था वह कितना भी महान क्यों न नजर आता हो उसे वर्तमान में कायम नहीं रहने देगा। पत्रकारिता की दुनिया भी प्रगतिवादी तासीर के कारण बदलनी ही थी। आधुनिक दौर में दुनिया के बदलने का सबसे बड़ा इंजन तकनीकी विकास साबित हो रहा है। फिर भी तकनीक के साथ-साथ इंसान का बदलना एक पहेली से कम नहीं है। आज यह अंदाजना मुश्किल हो गया है कि इंसान तकनीक को चला रहा है या तकनीक इंसान को हांक रही है।
पत्रकारिता के संदर्भ में यह सवाल काफी मौजूं है। तकनीक में वेग निहित है जबकि मानवीय सृजनात्मकता की सीमायें निश्चित हैं। इस कारण चीजों को सर्वसुलभ बनाने के लिये मानवीय व्यवस्थाओं का तकनीकी पर आश्रित होते चले जाना लाजिमी था। आज प्रकृति की चर्चा बहुत हो रही है साथ-साथ में प्राकृतिक हुनर की भी लेकिन चीजों को सर्वसुलभ बनाने के लिये उत्पादकता को विशाल करने की बाध्यता है। इसलिये प्रकृति से दूर चले जाने के अनुपात में सुविधाओं के साथ-साथ समस्याओं के बढऩे की चिंतायें भी विमर्श के केन्द्र में आ रही हैं लेकिन तकनीक का मोह छोडऩा इतना आसान नहीं है। इसलिये यह विमर्श किसी सार्थक मोड़ को अंजाम नहीं दे पा रहा।
संदर्भ पत्रकारिता का है। तकनीक में स्टीरियोटाइप उत्पादन होता है। इसमें मानवीय हुनर विचारों का तत्व जुड़ा होने की वजह से बाधक समझा जाता है। इसलिये तकनीकी क्रान्ति का उभार आते ही विचारों और इतिहास के अन्त की घोषणा कर दी गयी। पत्रकारिता में इसके चलते बहुत चीजें बदलीं। सबसे पहले तो यह है कि पहले के जमाने में पत्रकारिता कोई कैरियर नहीं थी। सामाजिक सरोकारों से जुड़े लोगों की अनिवार्य परिणति पत्रकार बन जाने के रूप में होती थी। हमारी आजादी की लड़ाई में गांधी से लेकर शहीद ए आजम भगत सिंह और बाबा साहब अम्बेडकर तक विपरीत ध्रुवों पर खड़े महापुरुषों में एक बात कामन है कि उन सभी ने अपने लक्ष्य के लिये पत्रकारिता को साधन और माध्यम बनाया। आजादी के बाद भी लम्बे समय तक सामाजिक, राजनैतिक कार्यकर्ता ही पत्रकार के अवतार में आते रहे लेकिन पत्रकारिता कैरियर के रूप में मान्य होने के बाद स्थितियां बदलीं। सामाजिक कार्यकर्ता होने की पूर्व शर्त पत्रकार के लिये अनिवार्य नहीं रह गयी। सामाजिक सरोकारों के लिये संघर्ष की कोख से उपजने वाली इस प्रजाति की जगह पेशेवर कुशलता बढ़ाने के नाम पर डिग्री डिप्लोमा से तैयार किये जाने वाले पत्रकारों ने ले ली। कहा यह गया कि तकनीकी क्रान्ति को देखते हुए पत्रकारिता में प्रवेश के लिये व्यवसायिक प्रशिक्षण इस क्रान्ति की बारीकी को जानने के लिये आज के दौर में जरूरी हो गया है।
बहरहाल विचारों के अन्त के ऐलान की प्रतिच्छाया इस नई पत्र कार बिरादरी के उदय के रूप में झलक उठी। अखबारों से लेकर इलेक्ट्रानिक चैनलों तक प्रतिबद्ध पत्रकारों की टीम की बजाय सम्पादकीय एजेण्डा मार्केटिंग गुरु की प्रेरणा से तय होने लगा। खबर को बिकने योग्य बनाने की सेल्समैन प्रतिभा इस परिवर्तन के साथ एक कला कही जाने लगी। इस कौशल ने किसी परिघटना को उसकी सम्पूर्णता में प्रस्तुत करने का आग्रह समाप्त कर दिया। जो खबर को आकर्षक, सनसनीखेज, रोमांचक और चौंकाने वाली बना दे उतना पहलू अलग करके प्रस्तुत करना नई पत्रकारिता का धर्म बन गया। भले ही इस बाजीगरी से परिघटना के अर्थ बदल जायें। क्या अपनी इस नियति की वजह से आधुनिक पत्रकारिता समाज में एक अराजक उथल पुथल का उत्प्रेरक नहीं बनती जा रही है।
विचारों के अन्त की उद्घोषणा को चरितार्थ करने के लिये पत्रकारिता के कलेवर में कई और बदलाव भी हुए हैं। विचारों की जगह सूचनाओं की भरमार आधुनिक पत्रकारिता का अभिन्न अंग है। पहले दूरगामी प्रभाव वाली सूचनाओं को चाहे वे अन्तर्राष्ट्रीय हों, राष्ट्रीय हों अथवा प्रादेशिक, प्रमुखता से चुना जाता था लेकिन आज व्यापक महत्व वाली सूचनाओं की बलि चढ़ाकर सारा स्पेस स्थानीय सूचनाओं के लिये अर्पण कर दिया जाता है। आखिर एक सामान्य व्यक्ति को कितनी सूचनाओं की जरूरत है। उसे सिर्फ वे सूचनायें चाहिये जो उसकी चेतना के विकास की जरूरत से जुड़ी हों। आखिर लोगों के लिये सूचनायें हासिल करने के अलावा भी और काम हैं। अपनी दैनन्दिनी में सूचनाओं के लिये समय का जितना अनुपात व्यक्ति तय कर सकता है। उसमें उसे उतनी ही सूचनायें पढऩे और देखने की फुर्सत हो सकती है जो बहुत महत्वपूर्ण हैं। स्थानीय सूचनाओं की बाढ़ का समाज की जागरूकता से कोई सम्बन्ध नहीं है। अपनी व्यवसायिक जरूरतों की पूर्ति के लिये मीडिया के असल सूत्रधार लोगों के दिमाग को सूचनाओं का बंधक बनाकर समाज के साथ बड़ा अनर्थ कर रहे हैं।
बात शुरू हुई थी दुनिया के प्रगतिवादी चरित्र की। फिर इसी बिन्दु पर लौटना होगा। इस सम्बन्ध में दो बातें हैं। स्वरूपगत बदलाव प्रकृति का अनिवार्य लक्षण है लेकिन उसकी तात्विकता कभी नहीं बदलती। तात्विकता सनातन है। इसलिये यह कहना कि तकनीकी क्रान्ति के कारण मीडिया में हो रहे बदलाव खत्म करके पुरानी स्थितियों में लौटना असंभव है। पूरी तरह से प्रवंचना है। पत्रकारिता मूल रूप से एक सामाजिक गतिविधि है कोई स्वतंत्र पेशा नहीं। इस नाते उसका लक्ष्य लोगों की चेतना का विकास करना है। इस सनातन तात्विकता में कोई बदलाव नहीं हो सकता। यह समझदारी लोगों में आनी चाहिये। यह पत्रकारिता की विकृत हो रही स्थितियों को सुरक्षित करने की ओर बढऩे का प्रस्थान बिन्दु होगा। पत्रकार बनने की पूर्व शर्त के रूप में सम्बन्धित की सामाजिक क्रियाकलापों की पृष्ठभूमि को फिर से बहाल करना और 24 घंटे के समाचार प्रसारण जैसे लोगों के साथ दिमागी अत्याचार को खत्म करना इस दिशा में आगे बढऩे के कुछ सूत्र हो सकते हैं। अगर इच्छा शक्ति हो तो इस पर एक ऐसा विमर्श शुरू हो सकता है जिससे कई अनोखे और उपादेय विकल्प सामने लाये जा सकेें। क्या आप भी इस विमर्श को गति देने के लिये अपने विचार बिन्दु इसमें जोड़ेंगे।

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

1 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Bhola nath Pal के द्वारा
May 12, 2016

यह कहना कि तकनीकी क्रान्ति के कारण मीडिया में हो रहे बदलाव खत्म करके पुरानी स्थितियों में लौटना असंभव है। पूरी तरह से प्रवंचना है। पत्रकारिता मूल रूप से एक सामाजिक गतिविधि है कोई स्वतंत्र पेशा नहीं। इस नाते उसका लक्ष्य लोगों की चेतना का विकास करना है। इस सनातन तात्विकता में कोई बदलाव नहीं हो सकता। यह समझदारी लोगों में आनी चाहिये। ………..उचित मार्ग दर्शन .अच्छा चिंतन .


topic of the week



latest from jagran