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भ्रष्टाचार के खिलाफ हथियार उठाने में क्यों डर रहे हैं मोदी

Posted On 24 Jul, 2016 में

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कांग्रेस के 50 वर्ष के कूड़े को उठाने के नाम पर नरेंद्र मोदी ने लगभग 26 महीने गुजार दिये जबकि सफाई मंत्री नही प्रधानमंत्री हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री के उनके कार्यकाल का जो सुनहरा खाका खीचा गया था उससे लोग उन्हें गवर्नेंस गुरु मान बैठे थे। लेकिन उनके अभी तक के कार्यकाल में सख्त प्रशासन की कोई झलक देखने को नही मिल पाई है। माना कि गवर्नेंस के संदर्भ में जिन कारकों का लोगों से सीधा संबंध है उनका नियंत्रण मुख्य रूप से राज्य सरकारों के हाथ में होता है। पुलिस, तहसील, अस्पताल का काम सुधारने की पहल राज्य सरकारों के सहयोग के बिना नही हो सकती। जबकि यही सेक्टर जनता के प्रत्यक्ष सरोकार के हैं। लेकिन केंद्रीय प्रशासन के नियंत्रण वाले सेक्टरों में तो साफ-सुथरी कार्य संस्कृति नजर आनी चाहिए थी। मीडिया में भले ही बदलाव का सब्जबाग उकेरा जाता हो। लेकिन धरातल पर कोई ऐसा बदलाव नही हुआ जो जनता की प्रसन्नता बढ़ाने वाला हो।
गवर्नेंस को ले तो अच्छी गवर्नेंस में सबसे बड़ी बाधा भ्रष्टाचार है। मुख्य रूप से भ्रष्टाचार को दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है। इसका एक रूप सरकार में बैठे लोगों की विकास के हर काम में कमीशन खोरी के रूप में नुमाया होता है। भ्रष्टाचार के इस रूप का मुददा इंदिरा गांधी के जमाने में बहुत उठता था। इंदिरा गांधी का जबाव होता था कि विकास के साथ कमीशन खोरी का भ्रष्टाचार अनिवार्य परिघटना है जो पूरे संसार में व्याप्त है। इंदिरा गांधी की इस दलील को तत्कालीन विपक्ष से लेकर अखबार तक हजम नही कर पाते थे और इस मुददे पर उनकी बहुत आलोचना होती थी। लेकिन आम लोगों को भ्रष्टाचार का दर्द कितना तीखा होता है उस समय इस बात का अंदाजा नही था। वजह यह थी कि उस समय लोगों के सरोकारों से सीधे जुड़े विभागों में भ्रष्टाचार के नाम पर आज जैसी नंगई नही थी। आज भ्रष्टाचार की मार से लोकतंत्र कराह रहा है, संविधान कराह रहा है, मौलिक अधिकार चिघ्घाड़ भर रहे हैं। प्रशासन हर स्तर पर लोगों से रंगदारी वसूली का संेटर बन गया है। किसी के घर में हत्या हो जाये तो थाने को मुकदमा लिखने का पैसा चाहिए। असहाय विकलांग का प्रमाण पत्र बिना पैसा लिए वे डाॅक्टर बना नही सकते जो पूजा पाठ के दिखावे से धार्मिकता का ढोंग रचाने में आगे रहते हैं। जनता इतनी बेबस तो राजशाही और औपनवेशिक शासन में नही थी जितनी आज है। शिकायत करिये तो कोई कार्रवाई नही होती। मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव पोस्टिंग बेचतें हैं और इसके बाद उगाही करने वाले अधिकारियों को संरक्षण देने का महीन अलग लेते हैं। शिकायतों पर कार्रवाई करने लगेंगे तो उन्हें कोई पैसा क्यों देगा। ऐसी व्यवस्था को स्वराज मानने से ज्यादा प्रवंचना दूसरी कोई नही हो सकती।
अपनी ईमानदारी का नगाड़ा बजवाने वाले मोदी ने अभी तक इस दिशा में क्या कोई कदम उठाया है। राबर्ट वाड्रा, वीरभद्र सिंह, भूपेंद्र हुडडा इन लोगों की जांच करवाकर वे भ्रष्टाचार से लड़ाई का ढोल पीट रहे हैं लेकिन यादव सिंह के भ्रष्टाचार में हाथ बटाने वाले सपा नेता का नाम होने पर सीबीआई के हाथ बाधते हुए भी उन्हें सबने देखा है। भ्रष्टाचार से लड़ाई को राजनीतिक स्वार्थ का औजार बनाने से कोई समस्या हल नही हो सकती। इस पैंतरेबाजी से आरोप-प्रत्यारोपों को बल मिलता है और यही हो रहा है।
किसी भी बदलाव के लिए निहित स्वार्थों के खिलाफ हथियार उठाने की इच्छा शक्ति होनी चाहिए। लेकिन इसके अभाव में मोदी सरकार के पास इनके सामने आने से कतराने के हजार बहाने हैं। एक सबसे बड़ा बहाना यह है कि राज्य सभा में बहुमत न होने की वजह से वे कुछ नही कर पा रहे। अब सवाल यह है कि क्या नही कर पा रहे हैं। राज्य सभा में बहुमत होता तो जिन आर्थिक सुधारों को वे आगे बढ़ाते उनका न तो कोई संबंध भ्रष्टाचार को खत्म करने से है और न ही तलछट के लोगों के उत्थान से। सरकार के करने के लिए 26 महीने बहुत होते हैं। कुछ घंटों में ही सरकार बदलाव के लिए जनता को आश्वस्त कर सकती है जिसे उत्तर प्रदेश के लोगों ने 2007 मंे प्रत्यक्ष देखा जब मायावती ने शपथ ग्रहण के बाद कानून व्यवस्था के संबंध में कार्य करने के लिए पुलिस को केवल कुछ घंटे का समय दिया और उतने घंटे भी नही लगे पुलिस ने नतीजा दे दिया। निर्णायक रुख इतना कि कानून व्यवस्था के मामले में उनकी सरकार कोई समझौता नही करेगी यह साबित करने के लिए उन्होंने अपने सांसद को जेल भिजवाने में भी हिचक नही की। मायावती में कई कमियां हो सकती हैं और उनके कार्यकाल के उदाहरण देने का मतलब उन्हें श्रेष्ठ साबित करना नही है केवल यह बताना है कि निजाम बदल गया है इसका एहसास कराने को अपने पूर्ववर्ती के कूड़े को हटाने के लिए कई महीने गुजार देने की मोहलत की जरूरत नही होती। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री तो बहुत बड़ी चीज हैं अगर किसी जिले में कोई कलेक्टर या एसपी ढंग का आ जाये तो वह 24 घंटे के अंदर व्यवस्था को पटरी पर लाकर दिखा देता है।
मोदी यह कर दिखाने के लिए उन किसानों के के्रडिट कार्ड बनाने में बैंकों द्वारा की जाने वाली लूट खसोट को बंद करा सकते थे जिनके लिए वे आये दिन घड़ियाली आंसू बहाते नजर आते हैं। लेकिन मनमोहन सरकार में भी उसी किसान का के्रडिट कार्ड बन पाता था जो बैंकर्स को रिश्वत दे सकें और आज भी यही हो रहा है। लोन देने में भी यही आलम है जिसकी वजह से केवल 7 प्रतिशत ब्याज पर किसानों की कर्ज सहायता का एलान बेमानी होकर रह गया है। किसानों को कर्ज का जितना बड़ा अनुपात अग्रिम रिश्वत में खर्च करना पड़ता है उससे बैंक कर्जा साहूकार के कर्जे से भी मंहगा हो जाता है। बैंकें केंद्र सरकार के नियंत्रण में हैं लेकिन उनकी कार्यप्रणाली को साफ-सुथरा बनाने के लिए कदम उठाने की बात तो दूर इसकी चर्चा तक मोदी सरकार में नही हो रही। अकेले बैंकों का मामला नही है केंद्र ने भ्रष्टाचार को काबू में करने का कितना प्रयास किया इसकी पोल ट्रेन यात्री को आज भी बिना रिजर्वेशन के सीधे दो-तीन सौ रुपये पकड़ाकर एसी डिब्बे में सफर का सुख लेते हुए देखने को मिल जाती है। आज भी बीएसएनएल नेटवर्क का उपभोक्ता परेशान रहता है क्योंकि भारत सरकार के इस उपक्रम के अधिकारी निजी कंपनियों से रिश्वत लेकर इसकी सेवा को लंगड़ा बनाये रखते हैं। कहने का मतलब यह है कि केंद्र का कोई विभाग ऐसा नही है जिसमें मोदी के कुर्सी पर बैठ जाने की वजह से अधिकारी और कर्मचारी रिश्वत मांगने से डरने लगे हों।
सही बात यह है कि भ्रष्टाचारियों से सामना करने से कोई डर रहा है तो वह खुद मोदी सरकार है। उसने दिल्ली सरकार के प्रधान सचिव को भ्रष्टाचार में जेल भिजवा दिया। जिसके पीछे राजनैतिक उत्पीड़न को माना जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी को मालूम है कि लगभग हर आईएएस अधिकारी भ्रष्ट है और वे अगर 50 आईएएस अधिकारियों के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति की जांच सीबीआई को सौंपकर उनके साथ राजेंद्र कुमार को जेल भेजते तो उनकी आलोचना क्यों होती। प्रधानमंत्री भी जानते होंगे कि इस देश में असली पावर आईएएस अधिकारियों के पास है और अगर इस संवर्ग के लोगों के लिए रिश्वत लेने की गुंजाइश खत्म कर दी जाये तो फिर प्रधानमंत्री को कुछ नही करना आईएएस अधिकारी खुद हर विभाग को इतना टाइट कर देंगे कि रिश्वत लेना भूल जाये।
कुछ करने के नाम पर मोदी मैजिक में स्मार्ट सिटी, बुलेट ट्रेन जैसी इंद्रधनुषी योजनायें हैं लेकिन जब देश में आम आदमी बच्चें की पढ़ाई और इलाज के खर्चे में बीबी के गहने से लेकर घर, जमीन बिकवा लेने को मजबूर होने की हालत में है तो यह ऐश्वर्य तो सपने में भी उसे नसीब नही हो सकता। शिक्षा और स्वास्थ्य मुफ्त हो और इसमें भ्रष्टाचार का बिल्कुल भी दखल न हो आम आदमी के लिए तो ऐसी व्यवस्था चाहिए। यह उसके मौलिक अधिकार हैं। जिनकों वह अदालत से भी हासिल नही कर सकता क्योंकि हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक के वकीलों की फीस उसकी हैसियत से बहुत ज्यादा है। इसलिए देश की न्यायिक संस्थायें तक काले धन के मगरमच्छों का हस्तक बनकर रह गईं हैं। वे लोग जो ठेकों में सरकारी फंड का करोड़ो रुपये लूटते हैं अगर उन पर कोई आंच आती है तो वे सुप्रीम कोर्ट तक उसी लूट से दौड़ लगाने मे सक्षम हैं और न्यायिक भूल-भुलैया का आलम यह है कि गलत आदमी किसी न किसी स्तर पर अदालत को गुमराह करके अपने खिलाफ कार्रवाई रोकने के लिए स्टे लेने में सफल हो ही जाता है।
भाजपा में एक बार लालकृष्ण आडवाणी के लौह पुरुष बिंब को जनमानस में उस समय दरखता देखा गया था जब वे गृहमंत्री बनने के बाद आतंकवाद पर प्रभावी नियंत्रण की लोगों की उम्मीदों पर नाकाम हो गये थे। मोदी के मामले में भी उनकी समझौतापरस्ती से फिर वैसी ही स्थितियां बन रही हैं। सरकारी कर्मचारियों के वेतन के मामले में भी उनके तदर्थवादी सोच से यही बात उजागर होती है। जहां निजी क्षेत्र में हाड़तोड़ मेहनत करने वालों को न्यूनतम मेहनताना दिलाने में उनकी सरकार भी कामयाब नही हो पा रही वहीं सरकारीतंत्र को जबावदेह बनाने की कोशिश न कर पाने के बावजूद वे कर्मचारियों को सांतवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू करने के बाद आम आदमी के मुकाबले एक तरह से सोने में तौल चुके हैं फिर भी सरकारी कर्मचारी संतुष्ट नही है। एक समय था जब वास्तव में सरकारी कर्मचारियों को वेतन न के बराबर मिलता था और उनके लिए ऊपरी कमाई की गुंजाइश भी तमाम विभागों में नही थी। उस समय बेहतर हालत में होने की वजह से कारोबारियों को मुनाफाखोर की गाली देकर और कर्मचारियों की वेतनवृद्धि के लिए हड़तालें करवाकर कम्युनिस्ट हीरो बन जाते थे लेकिन आज हालात बदल चुके हैं। पूरा सरकारीतंत्र जनता के उत्पीड़न और शोषण के संस्थान में तब्दील हो चुका है। जिससे लोगों की कोई हमदर्दी उनके साथ नही रह गई बल्कि जनमानस में सरकारीतंत्र की पहचान सबसे बड़े खलनायक के रूप में उभर रही है। कम्युनिस्ट अपनी रूढ़िवादिता की वजह से उनका समर्थन करें तो करें लेकिन मोदी को तो यह सोचना चाहिए कि लोगों के टैक्स का पैसा वंचित जनता के अभावों को दूर करने की कोशिश के लिए है या सारा सरकारी खजाना उन पर लुटा देने के लिए है जो जनता के भीषण दुख का कारण बने हुए हैं।
नक्सल प्रभावित राज्यों से भी कोई सबक नही लिया जा रहा लेकिन अगर निहित स्वार्थों को साधकर अपनी अस्तित्व रक्षा की चालाकी यह सरकार भी दिखाती रहेगी तो उग्रवाद महामारी की तरह सारे देश में पैर पसार लेगा। चूंकि मोदी में कुछ करने का माददा तो है लेकिन अगर उनके प्रति अंध भक्ति का वातावरण सहेजा जायेगा तो मोदी निश्ंिचत होकर यथा स्थितिवादी रास्ते पर चलते रहेंगे। झकझोर कर उन पर भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए दबाव बनाने की जरूरत है। अगर भ्रष्टाचार खत्म हुआ तो गवर्नेंस अपने आप आ जायेगी और तभी देश में बेहतर अनुशासन का माहौल संभव है जिसमें साम्प्रदायिकता और जातिवाद जैसी कुरीतियां अपने आप डायल्यूट हो जाती हैं।

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