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कांग्रेस को भी सत्ता की ओर जाने का रास्ता बनारस में ही क्यों सूझा

Posted On 5 Aug, 2016 में

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मोदी युग के बाद सत्ता के लिए रास्ते वाराणसी से होकर गुजरने लगे हैं। उत्तर प्रदेश में 27 साल बाद सिंहासन पर वापसी के लिए तड़प रही कांग्रेस ने भी इस कारण आगामी विधानसभा चुनाव में आगे बढ़ने के लिए बनारस को चुना तो यह स्वाभाविक है। मंगलवार को वे रोड शो के लिए बनारस की सरजमीं पर उतरीं तो लोगों का ऐसा सैलाब उमड़ा कि जिसकी उम्मीद उन्होंने खुद नही की होगी। हालांकि यह रोड शो वे रास्ते में ही बीमार पड़ जाने के कारण पूरा नही कर सकीं लेकिन इस शानदार शो के बाद उन्होंने प्रतिद्वंदी दलों की नींद हराम कर दी है। सबसे ज्यादा बेचैनी में भाजपा है। कांग्रेस मुक्त भारत का दिवास्वप्न देख रहे भाजपा के तमाम नेताओं की कांग्रेस के इस रोड शो के बाद बोलती जैसी बंद है। हालांकि अभी यह मानना अतिश्योक्ति ही होगा कि इस रोड शो के आधार पर यह घोषित कर दिया जाये कि कांग्रेस प्रदेश की सत्ता के मुख्य खिलाड़ियों में आगे आ चुकी है। गंभीर लोग यह मान रहे हैं कि नये संयोजन से कांग्रेस ने कुछ ही दिनों में उत्तर प्रदेश में जो हवा बना ली है उससे उसके विधायकों का आंकड़ा वर्तमान से आगे निकल जाना तय हो गया है। यह लोग मानते है कि अगर कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में आधा सैकड़ा विधायक भी जिता लिये तो यह उसकी बड़ी उपलब्धि होगी। इसका असर अन्य राज्यों में भी होगा। खासतौर से पड़ोस के मध्यप्रदेश में अगले विधानसभा चुनाव तक कांग्रेस द्वारा तख्तापलट कर देने के जो कयास लगाये जा रहे हैं वे इस नतीजे से बलवती हो सकते हैं।
राजनीतिक पार्टियां वैचारिक तपिश से भरे आंदोलनों और संघर्षों के सहारे आगे बढ़ती रहीं हैं लेकिन यह ट्रेंड अब पलट चुका है। मार्केटिंग की दुनियां के खिलाड़ी चुनावी दिशा को तय करने में समर्थ हो गये हैं। इस बयार ने भारतीय लोकतंत्र में भी इतिहास और विचारों की मौत की इबारत लिख डाली है। खुद मोदी की सफलता में प्रशांत किशोर जैसे इवेंट मैनेजर की सबसे बड़ी भूमिका थी जिन्हें इस बार कांग्रेस ने प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए हाईजैक कर लिया है। लेकिन प्रशांत किशोर ने उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के पुनर्जीवन का ठेका लेकर बड़ा रिस्क लिया था क्योंकि कांग्रेस इस प्रदेश में जितने नीचे गर्त में चली गई थी उसमें से उबर कर उसके बाहर आ पाने की उम्मीदें कांग्रेसी कार्यकर्ताओं तक के मन में मर चुकी थी। इस मामले में प्रशांत किशोर के जीवट को दाद देनी पड़ेगी। उन्होंने हाल ही में जो ताबड़तोड़ एक्शन किये उससे रातों-रात फिजा पलट गई है। हालांकि हम जैसे लोग इसके बावजूद इवेंट मैनेजर लोकतंत्र को हांकने वाले बन जायें इस प्रवृत्ति को शुभ शकुन नही मानते। लेकिन इससे प्रशांत किशोर की क्षमताएं और योगदान कमतर नही हो सकता।
मार्केटिंग गुरुओं के खेल के अपने नियम हैं। उन्हें अपनी हर पेशकश को नाटकीय और चमत्कारिक बनाने में प्रवीणता हासिल है। प्रशांत किशोर की सलाह से उत्तर प्रदेश के लिए कांग्रेस द्वारा घोषित अपनी नई टीम में ही इसकी झलक देखने को मिल गई थी। इस टीम के नाम सामने आते ही मुर्दा पड़ी पार्टी में तेज हलचल पैदा हो गई। इसके बाद उन्होंने लखनऊ में राहुल गांधी का जनसंवाद कार्यक्रम आयोजित कराया। इसमें राहुल एक अलग अंदाज में नजर आये। जनसंवाद कार्यक्रम में भीड़ तो उम्मीद से ज्यादा जुटी ही थी उसे तरंगित मोड़ पर लाने में राहुल की कामयाबी के पीछे भी प्रशांत किशोर का ही निर्देशन था। इसके बाद सोनिया गांधी का बनारस का रोड शो। जिसके बाद से तो कांग्रेसी अति उत्साह में हैं।
कांग्रेस परम्परागत रूप से ब्राहमण, दलित और मुसलिम गठजोड़ की पार्टी रही है। लेकिन उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ दशकों से सामाजिक न्याय की राजनीति जिस तरह से हावी हुई उसमें कांग्रेस भी अपने नये सामाजिक आधार को तैयार करने की जरूरत महसूस करने को मजबूर थी। ऐसे माहौल में प्रशांत किशोर का पार्टी के हरावल दस्ते में ब्राहमणों को फिर शामिल करने का आग्रह किसी को पच नही रहा था। लेकिन मार्केटिंग के गुरू शायद इसीलिए कामयाब हैं कि वे लोगों की नब्ज को पकड़ने की कला अच्छी तरह जानते हैं। वाराणसी उत्तर प्रदेश में ब्राहमण समाज का स्नायु केंद्र है। मोदी के निर्वाचन क्षेत्र से ज्यादा बनारस की इस विशेषता को प्रशांत किशोर ने अहमियत दी और वाराणसी में उनके रोड शो की शुरूआत बाबा साहब अंबेडकर की प्रतिमा और समापन कमलापति स्मारक पार्क में कराने का रूटचार्ट भी बेहद योजनाबद्ध था। कमलापति त्रिपाठी उत्तर प्रदेश में ब्राहमण अभिमान के प्रतीक थे। उस समय के लोग बताते है कि उनसे मुलाकात में हर किसी के लिए उनके चरण स्पर्श जरूरी था जबकि वे चरण स्पर्श करने वालों को नजर उठाकर देखते भी नही थे तांकि उसे यह एहसास बना रहे कि वह कितना नाचीज है। बहरहाल कमलापति त्रिपाठी की स्मृति को तहखाने से निकालकर बाहर लाने का ब्राहमणों के मर्म पर आज भी पर्याप्त असर होगा। प्रशांत किशोर का यह आंकलन एकदम सटीक था अन्यथा आज की परिस्थिति में जबकि ब्राहमण समाज में मोदी का जादू सिर चढ़कर बोल रहा है, सेंध लगाना आसान नही हो सकता था लेकिन वाराणसी में सोनिया गांधी के रोड शो में ब्राहमणों का जो रिस्पांस देखने को मिला उससे साबित हो गया कि प्रशांत किशोर ने असंभव को संभव कर दिखाया था। ब्राहमणों को आगे करने के पीछे उनकी अन्य कौमों को भी प्रेरित करने की क्षमता का ध्यान प्रशांत किशोर को रहा होगा। गांव स्तर पर एक ब्राहमण कार्यकर्ता अपने साथ अन्य कौम के पांच लोगों को जोड़ने की सहज क्षमता रखता है जबकि कई कौमें ऐसी हैं जिनके नजदीक रहने पर अन्य कौमों के पांच पहले से जुड़े लोग भाग जाते हैं। कांग्रेस का ब्राहमण, दलित, मुसलिम वृत्त ब्राहमण ही अपनी उक्त विशेषता के कारण पूरा कर सकते हैं। दलितों और मुस्लिमों में कैसे अपनी पुरानी पार्टी के प्रति अपनापा जगाया जायें। ब्राहमणों को इसके लिए सिखाने की जरूरत नही है, यह मंत्र उन्हें स्थाई रूप से सिद्ध है।
किसी राजनीतिक पार्टी का मोटो प्रतिद्वंदी पार्टी का सफाया कर देना नही हो सकता। लोकतंत्र में तो स्वस्थ्य मानसिकता तो यह कहती है कि टिकाऊ विपक्ष को पोसा जाये और लोकतंत्र की उच्च परंपरा में विश्वास रखने वाले लोग यह दायित्व फर्ज की तरह निभाते हैं। इसलिए कांग्रेस मुक्त भारत का नारा देकर भाजपा क्षुद्र राजनीति का नया प्रतिमान गढ़ रही है। भाजपा की इस गिरावट के पीछे समान सामाजिक आधार को लेकर कांग्रेस से उसकी असुरक्षा ग्रन्थि है। वर्ण व्यवस्थावादी पार्टी होने के कारण भाजपा यह समझती है कि राष्ट्रीय फलक पर उसका पूरी तरह विस्तार तभी हो सकता है जब ब्राहमण शत-प्रतिशत उसके पाले में आ जायें लेकिन कांग्रेस के रहते यह संभव नही है। इसलिए वह कांग्रेस मुक्त भारत की उच्चाटन क्रिया में लिप्त है।
बहरहाल भाजपा के हावी होने के बाद कांग्रेस की मध्यमार्गीय राजनीति की प्रासंगिकता बढ़ी है। इसलिए अगर उसमें उत्तर प्रदेश में जान आई है तो उसके समर्थन में गुणात्मक वृद्धि का अनुमान किया जाना स्वाभाविक है। लेकिन कांग्रेस उत्तर प्रदेश में अकेले भाजपा की नवजात बहार को ही रौंदती नजर नही आ रही है बल्कि उसके एकदम शुरू हुए पल्लवन से समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का कलेवर भी गड़बड़ाता नजर आने लगा है।

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1 प्रतिक्रिया

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Dr S Shankar Singh के द्वारा
August 11, 2016

प्रिय श्री के पी सिंह जी, सादर नमस्कार. आपके तर्कों से सहमत नहीं हो पा रहा हूँ.. मेरे अंदाज़ में उ प्रदेश में ब्राहण जन संख्या १० % के आस पास ही होगी. क्या इतने कक मतदाता के समर्थन से कांग्रेस सत्ता में आ जाएगी. आपका सारा विश्लेषण ब्राम्हणों के इर्द गिर्द ही घूमता है, बाकी ९० % जातियों का क्या होगा. चुनाव को आप मार्केटिंग के रूप में आप प्रस्तुतकर रहे हैं. पी के जैसे लोग कांग्रेस को वापस नहीं ला सकेंगेचाहे कितनी ही नौटंकी कर लें. डेमोक्रेसी मार्केटिंग की चीज़ नहीं है. यह जनता की पसंद की बात है, आप कहते हैं की भाजपा वर्ण व्यवस्था की पार्टी है. मैनें तो भाजपा में किसी वर्ण को प्रहय दिए जाते हुए नहीं देखा है. हाँ कांग्रेस ज़रूर जैसा आपने स्वयं लिखा ब्राम्हणों, दलितों, मुसलमानों के वोट नैंक पर आधारित पार्टी है. .अपने विश्लेषण में कृपया मुलायम सिंह और मायावती के लिए भी स्थान छोड़ दीजिये.


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