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उत्तर प्रदेश के नेताओं को क्यों हुआ सन्निपात

Posted On: 14 Nov, 2016 में

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उत्तर प्रदेश के नेताओं को क्यों हुआ सन्निपात
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 500 व 1000 के नोट रद्द करने के फैसले के रातोंरात अचानक ऐलान के बाद सबसे ज्यादा सकते में उत्तर प्रदेश के राजनेता हैं जहां विधानसभा चुनाव के मैदान में उतरने की पूरी तैयारी वे अपने तई कर चुके थे। उन पर वज्रपात जैसा हुआ है। जिस स्थिति में वे अपने को संभाल नहीं पा रहे। इसके पहले उत्तर प्रदेश के प्रमुख नेताओं पर चले आय से अधिक संपत्ति के मामलों का न्यायपालिका के पाले में जिस तरह हश्र हुआ उससे यह नेता और शहजोर हो गए थे। इस गुमान के नाते मोदी का झटका उन्हें बहुत हिला देने वाला साबित हुआ है।
मायाजाल को पौराणिक मिथकों में सबसे निकृष्ट छल के रूप में पहचाना गया है लेकिन वर्तमान बाजार व्यवस्था में मायावी हथकंडे सर्वोत्तम कौशल के पर्याय हैं। इससे राजनीति के मकसद भी बदल गए हैं। पहले व्यवस्था परिवर्तन की जनाकांक्षा सम्पूर्ण क्रांति का खाका रचती थी। चुनाव सुधार, शासन प्रणाली में परिवर्तन, आर्थिक मामलों में सीलिंग, सार्वजनिक जीवन में कार्य करने वाले एक्टविस्टों के लिए उच्चतम नैतिकता पर आधारित आचार संहिता आदि का पूरा पैकेज इसमें निहित रहता था क्योंकि परिवर्तन किसी एकांगी फैसले से फलित नहीं होता। परम्परागत राजनीति का यह दौर आर्थिक उदारीकरण के परिणाम पूरी तरह उजागर होने तक जारी रहा।
वीपी सिंह ने भी बोफोर्स दलाली को प्रतीक बनाकर व्यवस्था को भ्रष्टाचार मुक्त करके स्वच्छ बनाने की जो मुहिम छेड़ी थी उसमें इस सोच के तहत कि भ्रष्टाचार कोई स्वतंत्र परिघटना नहीं है बल्कि यह व्यवस्था के चरित्र में बहुआयामी विसंगतियों का अवश्यंभावी परिणाम होता है। राजनीतिक सुधारों का एक पूरा पैकेज जनता दल के एक्शन प्लान में शामिल किया था। साम्यवाद तो व्यवस्था के आमूलचूल पुनर्गठन और पुनर्संयोजन का ही दूसरा नाम है जिसके बारे में कुछ कहने की जरूरत नहीं है।
लेकिन नरेंद्र मोदी का फंडा दूसरा है वे मार्केटिंग वालों को सोहबत के राजनीतिज्ञ हैं। नाटकीय और चौंकाने वाले टिप्स से लोगों को सम्मोहित करके अपनी पार्टी और सरकार की मार्केटिंग उनकी फितरत में शामिल है। इसलिए इवेंट करके वे हर यज्ञ जीतने की ट्रिक अपनाते हैं। उन्होंने ऐसा ही कुछ रातोंरात बड़े नोट रद्द करने के फैसले से किया। मार्केटिंग की परम्परा के अनुरूप वे इसे अपने समय की सबसे बड़ी क्रांतिकारी परिघटना के रूप में प्रचारित करा रहे हैं।
मेरे जैसे लोगों का जहां तक सवाल है वे इसमें मोदी के करियर के लिए बहुत जोखिम को भी आंकते हैं। उन्होंने (मोदी ने) एक प्रयोग किया। हम मानते हैं कि इसमें उनकी पूरी नेकनीयती है और किसी को प्रोत्साहित करने के लिए इतना नैतिक आधार पर्याप्त है लेकिन प्रयोग सफल भी हो सकता है, असफल भी। जब यह प्रकट किया जाता है कि अमुक कदम प्रयोग नहीं दैवीय प्रेरणा का उपादान है तो उसके असफल होने से जनमानस में बहुत प्रतिकूल प्रतिक्रियाएं उत्पन्न होती हैं। जैसे गूढ़वाद के शमन के लिए प्रख्यात बौद्ध धर्म जब भैरवी चक्र के युग तक पहुंचते-पहुंचते रहस्यवादी दर्शन का अड्डा बन गया तो बाहरी आक्रमणों के समय उसकी प्रकट हुई निरीह और दीन-हीन स्थिति को देखना लोग गंवारा नहीं कर सके। समाज को महसूस हुआ कि इन्हें करिश्माई मानने के चलते उनके साथ धोखा हुआ है। बौद्धों को इसके बाद सामाजिक समर्थन बंद हो गया जो अपने मूल स्थान भारत में इस धर्म के सफाए का कारण बना।
प्रयोग को जरूरत से ज्यादा महिमामंडित करने के अपने खतरे हैं। इसे ध्यान में रखने की जरूरत है। बड़े नोटों को रद्द करने का फैसला अगर किसी समग्र रणनीति का पहलू नहीं है तो इस प्रयोग के फेल होने की आशंकाएं ज्यादा हैं। उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ दशकों से जो पार्टियां राजनीति में हावी हैं उनका औचित्य सामाजिक न्याय की जद्दोजहद पर आधारित है। न्याय और नैतिकता के बीच अभिन्न सम्बंध है। यह दोनों मूल्य एक वृत्त के अर्द्धांग हैं जिन्हें आपस में जुड़कर ही पूर्ण वृत्त बन सकता है। लेकिन न्यायवादी पार्टियों ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने सत्ता पर कब्जे के लिए साम, दाम, दंड, भेद हर हथकंडे को जायज घोषित करना चाहा है। उनके इस नैतिक विचलन की वजह से ही लोगों का विश्वास उनमें खत्म हुआ है, जिसका फायदा उठाने की कोशिश भाजपा कर रही है।
नादान दोस्त से होशियार दुश्मन ज्यादा अच्छा है। उत्तर प्रदेश में कुछ ऐसी स्थिति बनती जा रही है इसलिए लोग न्यायवादी पार्टियों के द्वारा उपजाई कुरीतियों का अंत चाहते हैं भले ही तात्कालिक तौर पर इसका लाभ भाजपा को देना पड़े लेकिन राजनीतिक सुधार से जुड़े इस उपक्रम के किसी नाटकीय फैसले से तार्किक परिणति पर पहुंचाया जा सकता है। यह सवाल भी मौजू है। उत्तर प्रदेश में सामाजिक न्याय के लिए सत्ता हासिल करने के निमित्त जायज-नाजायज किसी भी तरीके से चुनाव फंड इकट्ठा करने को पुनीत घोषित कर दिया गया है। गवर्नेंस की सबसे ज्यादा जरूरत बहुतायत गरीबों को है लेकिन प्रशासन को दुधारू गाय की तरह चुनाव फंड जमा करने का जरिया बनाने की भावना हो तो अधिकारियों की निरंकुशता पर लगाम कैसे लगाई जा सकती है।
बहरहाल प्रशासनिक दमन उत्तर प्रदेश में पराकाष्ठा पर है इसलिए सत्ता परिवर्तन होना चाहिए पर चुनावी फंड कलेक्ट करने के लिए राजनीतिक कुरीतियों का अंत करने का उपाय क्या है। अगर यह लक्ष्य हासिल करने की सदेच्छा है तो चुनाव प्रचार के लिए सरकारी फंड की स्थापना और प्रमुख दलों और प्रत्याशियों को उसके माध्यम से अनुदान की व्यवस्था के प्रस्ताव पर गौर क्यों नहीं किया जा रहा जो कि जनता दल युग के समय से ही राजनीतिक सुधार की हामी पार्टियों के एजेंडे में शीर्ष पर है। सरकार को अपनी परिवर्तनवादी मंशा को प्रमाणिकता प्रदान करने के लिए व्यवस्था की ओवरहॉलिंग का नक्शा सामने रखकर फैसले लागू करना चाहिए। बड़े नोट रद्द करने के फैसले में ओवरहॉलिंग का कंसेप्ट कहीं नजर नहीं आता है इसलिए सरकार की नीयत को अगर संदिग्ध माना जा रहा है तो इसमें अजीब क्या है?

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