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राजनीति में भी भारी पड़ जाती पहलवानी, चरखा दांव के आगे दूसरे पैंतरे बेमानी

Posted On 21 Nov, 2016 में

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राजनीति के लिए पहलवान होना कोई विशेष योग्यता हो सकती है, यह मुलायम सिंह के पहले शायद ही किसी ने सोचा हो। इसीलिए उनका प्रिय चरखा दांव राजनीति के सबसे अचूक पैंतरे का पर्याय बन चुका है। अपने भाई और पुत्र में से किस पर वे चरखा दांव साध रहे हैं और क्यों,
इसका उत्तर देना आसान नहीं है लेकिन मुलायम सिंह के चरखा शगल से हैरान और परेशान होने की बारी शिवपाल और अमर सिंह की है जो मान चुके थे कि शातिर मुलायम सिंह को वे अपने शीशे में उतार चुके हैं।
अपने चचेरे भाई प्रो. रामगोपाल यादव के प्रति कुछ ही सप्ताह पहले मुलायम सिंह इतने तल्ख हो रहे थे कि शिवपाल सिंह यादव और अमर सिंह को सपने में भी यह ख्याल न आया होगा कि अब हाल-फिलहाल वे फिर रामगोपाल के लिए पसीज सकते हैं। रामगोपाल ने पार्टी में सभी पदों सहित वापसी की घोषणा होने के तीन दिन पहले ही इटावा में प्रेस कांफ्रेंस कर यह ऐलान किया था कि वे नेताजी का ताउम्र सम्मान करते रहेंगे लेकिन पार्टी में वापसी की प्रार्थना के लिए उनसे मिलने नहीं जाएंगे। उन्होंने इस दौरान पार्टी के संविधान की चर्चा भी करना जरूरी समझा था जिसे लेकर कहा गया था कि उन्होंने इसके जरिए पार्टी का विशेष राष्ट्रीय अधिवेशन बुलाकर उनके फैसले को चुनौती देने की धमकी दी है।
इस आभास के बाद कोई गणित लगाया जाता तो मुलायम सिंह के रामगोपाल पर फिर से मेहरबान होने का कोई फलित निकलकर सामने नहीं आ सकता था। होना यह चाहिए था कि मुलायम सिंह रामगोपाल के उक्त बयान से और भड़क जाते। रामगोपाल की प्रेस कांफ्रेंस के अगले दिन मुलायम सिंह की प्रतिक्रिया सामने आने का इंतजार किया गया लेकिन मुलायम सिंह चुप्पी साधे रहे। फिर भी कोई उनके अंतर्मन की इबारत को नहीं पढ़ सका। कयास यह लगाया जाता रहा कि मुलायम सिंह की खामोशी एक और तूफान के पूर्व की शांति है। हालांकि संसद सत्र के सिर पर आने तक जब मुलायम सिंह रामगोपाल की जगह राज्यसभा में पार्टी का नेता नियुक्त करने की जिम्मेदारी के प्रति उदासीनता ओढ़ रहे थे तभी लोगों को यह समझ लेना चाहिए था कि उनका यह रवैया किसी रहस्य का सूचक है पर मीडिया के लालबुझक्कड़ बताते रहे कि शिवपाल सिंह की मर्जी नहीं मानी गई तो राज्यसभा में बेनीप्रसाद वर्मा सपा के नेता घोषित हो जाएंगे और अखिलेश ने जिद ठान ली तो नरेश अग्रवाल की चित हो जाएगी। अमर सिंह को एक बार फिर राज्यसभा में पार्टी का सेनापति बनाए जाने की शिगूफेबाजी भी जोर पकड़ती रही।
मुलायम सिंह का मन बदल रहा है शिवपाल सिंह को यह खटका उसी समय हो गया था जब तथाकथित लोहियावादी और चरण सिंह वादी पार्टियों से गठबंधन की उनकी अखिलेश के मन के खिलाफ कोशिशों को ढील देते रहे मुलायम सिंह नोटबंदी पर आयोजित पत्रकार वार्ता में बोल गए कि सपा को उत्तर प्रदेश में गठबंधन की जरूरत क्या है, हां सपा में कोई विलय करना चाहे तो उसका स्वागत है। अन्यथा सपा साम्प्रदायिक शक्तियों से अकेले ही मुकाबले में सक्षम है। हालांकि मुलायम सिंह ने इस पत्रकार वार्ता में ऐसा अभिनय किया कि जैसे उन्होंने गठबंधन का अयाचित सवाल आने पर बिना सोचे-समझे यह बात मुंह से निकाल दी और फिर अटपटापन महसूस होते ही इस पर बल न देते हुए कहने लगे कि आज वे राजनीति पर कोई बात करने नहीं आये हैं। इस सवाल को दो-चार बार दोहराते रहे पत्रकारों को उन्होंने मीठी झड़प भी शांत करने के लिए दे डाली।
मुलायम सिंह कुछ दिनों से राजनीति के औंघड़ बाबा बन गए हैं। उनकी बातों में राजनीतिक प्रेक्षकों तक को तुक तलाशना मुश्किल होने लगा है। खुलकर कहा जाए तो यह माना जाने लगा है कि नेताजी का बुढ़ापे की वजह से दिमाग खिसक गया है लेकिन हफ्ते-दस दिन में अपने ही फैसले पलटकर उन्होंने प्रेक्षकों को हतप्रभ करके रख दिया है। कहा जा रहा है कि नेताजी बहुत ही घुटे हुए नेता हैं। उन्होंने अपने पुत्र को फ्री हैंड करने के लिए जितनी बारीकी से प्लानिंग की वह कोई दिमाग से बूढ़ा आदमी कभी कर नहीं सकता। मुलायम सिंह उम्र बढ़ती जा रही है लेकिन दिमाग और पैना होता जा रहा है।
शुबहा तो उसी समय हुआ था कि मुलायम सिंह कह कुछ रहे हैं और कर कुछ रहे हैं जब पारिवारिक महाभारत के क्लाइमैक्स के समय अखिलेश के पाले में जा खड़े हुए नरेश अग्रवाल ने रामगोपाल के निष्कासन के खिलाफ मुंह खोलने में भी गुरेज नहीं किया लेकिन अनुशासन के नाम पर कड़क दिखा रहे मुलायम सिंह उऩ पर कोई कार्रवाई नहीं की। महाराष्ट्र के सपा अध्यक्ष अबू आजम को भी अखिलेश और रामगोपाल के सुर में सुर मिलाकर अमर सिंह की खुली आलोचना करने के बावजूद कोई दंड नहीं दिया गया। लेकिन अति आत्मविश्वास की वजह से शिवपाल सिंह ने मुलायम सिंह के इन संकेतों को पढ़ने की कोई कोशिश नहीं की।
अब मुलायम सिंह ने दूसरे दलों के साथ गठबंधन की कोशिश के अध्याय पर अंतिम रूप से पटाक्षेप लगा दिया है। भले ही इसमें शिवपाल सिंह को नीचा देखना पड़ा हो। जो अपने को पार्टी में सर्व अधिकार संपन्न मानकर प्रशांत किशोर से लेकर अजीत सिंह तक से मुलाकात करने की मशक्कत कर रहे थे। जैसे इतना ही झटका पर्याप्त नहीं था। शिवपाल को एक और झटका तब लगा जब रामगोपाल की पार्टी की सदस्यता राज्यसभा में पार्टी के नेता और पार्टी में प्रधान महासचिव पद पर बहाली हो गई। इसका मतलब साफ है कि नीतिगत स्तर के पचड़ों में शिवपाल मान न मान मैं तेरा मेहमान बनने से बाज आएं। यह काम रामगोपाल के हवाले था और रहेगा।
अब शिवपाल सिंह को न कुछ कहते बन रहा है न चुप रहते। उन्होंने फिर कहा कि समाजवादी पार्टी में कुछ लोग भाजपा से मिले हुए हैं। साथ ही बोले कि वे पार्टी में जमीनों पर कब्जा करने वालों से लड़ते रहे हैं और लड़ते रहेंगे। कोई नादान भी समझ सकता है कि शिवपाल रामगोपाल के खिलाफ भड़ास निकालने के लिए विचित्र स्थितियों में फंस जाने की वजह से शब्द नहीं तलाश पा रहे। शिवपाल का किसी विचारधारा से कोई परिचय हो सकता है, यह बात एक प्रहसन की तरह है। हालांकि जिस दिन से समाजवादी पार्टी इस बार प्रदेश में सत्ता में आई है उसी दिन से मीडिया में लोहिया, आचार्य नरेंद्र देव और जयप्रकाश नारायण पर वे अपने बड़े-बड़े लेख छपवाने लगे थे लेकिन वे कितने बड़े थिंकटैंक हैं, य़ह उनके भाषण को सुनते रहे लोग अच्छी तरह जानते हैं। इसलिए जब वे आइडिलॉज के अंदाज में बोलने लगते हैं तो लोगों को हंसी आ जाती है। जमीन पर कब्जा करने वाले और नाजायज पैसा बनाने वालों से शिवपाल सिंह को अपनी राजनीति के जन्मजात से शायद घृणा रही है।
शिवपाल की ही तरह अमर सिंह का भी मानसिक संतुलन नये घटनाक्रम से डगमगा गया है। वे मारा गया ब्रह्मचारी की स्थिति में अपने को पा रहे हैं। कह रहे हैं कि रामगोपाल घर के भीतर के आदमी हैं इसलिए उन्हें तो इन होना ही था। मैं तो आखिर हूं तो बाहर का ही आदमी तो बाहर ही रहूंगा। अमर सिंह को सपा से दूसरी बार जुड़ने के बाद पाले गए अपने सारे मंसूबे धराशायी होते नजर आ रहे हैं। इस बीच अखिलेश समर्थक युवा नेताओं की वापसी की भी भूमिका लिखी जा चुकी है। मुलायम सिंह के उलटफेर से शिवपाल व अमर सिंह की हालत घर के न घाट के की बन गई है। जनमानस उन्हें विलेन के रूप में देख रहा है जबकि अखिलेश किसी फार्मूला छाप हिंदी फिल्म के आदर्श हीरो के रूप में लोगों की निगाह में नख्श हो चुके हैं। वाह नेता जी!

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